गुरुवार, 21 मार्च 2013

गंगोत्री धाम !! प्रथम भाग :


हिन्दू धर्म में पवित्र माने जाने वाली एवं जीवन दायनी माँ गंगा का उद्गम  पवित्र स्थल :

 


भाग -1.


स्वागत द्वार 
 गंगोत्री पवित्र गंगा नदी का उद्गम स्थान है। गंगाजी का मंदिर, समुद्र तल से लगभग 3042 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। भागीरथी के दाहिने ओर का परिवेश अत्यंत आकर्षक एवं मनोहारी है। यह स्थान उत्तरकाशी से 100 किमी की दूरी पर स्थित है। गंगा मैंया के मंदिर का निर्माण गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा द्वारा 18 वी शताब्दी के शुरूआत में किया गया था वर्तमान मंदिर का पुननिर्माण जयपुर के राजघराने द्वारा किया गया था। प्रत्येक वर्ष मई से अक्टूबर के महीनो के बीच पतित पावनी गंगा मैंया के दर्शन करने के लिए लाखो श्रद्धालु तीर्थयात्री यहां आते है। यमुनोत्री की ही तरह गंगोत्री का पतित पावन मंदिर भी अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर खुलता है और दीपावली के दिन मंदिर के कपाट बंद होते है।








 गंगोत्री का पौराणीक सन्दर्भ:


पौराणिक कथाओ के अनुसार भगवान श्री रामचंद्र के पूर्वज रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहां एक पवित्र शिलाखंड पर बैठकर भगवान शंकर की प्रचंड तपस्या की थी। इस पवित्र शिलाखंड के निकट ही 18 वी शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण किया गया। ऐसी मान्यता है कि देवी भागीरथी ने इसी स्थान पर धरती का स्पर्श किया। ऐसी भी मान्यता है कि पांडवो ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गये अपने परिजनो की आत्मिक शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ का अनुष्ठान किया था। यह पवित्र एवं उत्कृष्ठ मंदिर सफेद ग्रेनाइट के चमकदार 20 फीट ऊंचे पत्थरों से निर्मित है। दर्शक मंदिर की भव्यता एवं शुचिता देखकर सम्मोहित हुए बिना नही रहते।
शिवलिंग के रूप में एक नैसर्गिक चट्टान भागीरथी नदी में जलमग्न है। यह दृश्य अत्यधिक मनोहार एवं आकर्षक है। इसके देखने से दैवी शक्ति की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। पौराणिक आख्यानो के अनुसार, भगवान शिव इस स्थान पर अपनी जटाओ को फैला कर बैठ गए और उन्होने गंगा माता को अपनी घुंघराली जटाओ में लपेट दिया। शीतकाल के आरंभ में जब गंगा का स्तर काफी अधिक नीचे चला जाता है तब उस अवसर पर ही उक्त पवित्र शिवलिंग के दर्शन होते है।





गंगोत्री मन्दिर:

गंगोत्री मंदिर्

इतिहास:-

गंगोत्री शहर धीरे-धीरे उस मंदिर के इर्द-गिर्द विकसित हुआ जिसका इतिहास  कई वर्ष पुराना हैं, इसके पहले भी अनजाने कई सदियों से यह मंदिर हिदुओं के लिये आध्यात्मिक प्रेरणा का श्रोत रहा है। चूंकि पुराने काल में चारधामों की तीर्थयात्रा पैदल हुआ करती थी तथा उन दिनों इसकी चढ़ाई दुर्गम थी इसलिये वर्ष 1980 के दशक में गंगोत्री की सड़क बनी और तब से इस शहर का विकास द्रुत गति से हुआ।
गंगोत्री शहर तथा मंदिर का इतिहास अभिन्न रूप से जुड़ा है। प्राचीन काल में यहां मंदिर नहीं था। भागीरथी शिला के निकट एक मंच था जहां यात्रा मौसम के तीन-चार महीनों के लिये देवी-देताओं की मूर्तियां रखी जाती थी इन मूर्तियों को गांवों के विभिन्न मंदिरों जैसे श्याम प्रयाग, गंगा प्रयाग, धराली तथा मुखबा आदि गावों से लाया जाता था जिन्हें यात्रा मौसम के बाद फिर उन्हीं गांवों में लौटा दिया जाता था।
गढ़वाल के गुरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने 18वीं सदी में गंगोत्री मंदिर का निर्माण इसी जगह किया जहां राजा भागीरथ ने तप किया था। मंदिर में प्रबंध के लिये सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। माना जाता है कि जयपुर के राजा माधो सिंह द्वितीय ने 20वीं सदी में मंदिर की मरम्मत करवायी।
ई.टी. एटकिंस ने दी हिमालयन गजेटियर (वोल्युम III भाग I, वर्ष 1882) में लिखा है कि अंग्रेजों के टकनौर शासनकाल में गंगोत्री प्रशासनिक इकाई पट्टी तथा परगने का एक भाग था। वह उसी मंदिर के ढांचे का वर्णन करता है जो आज है। एटकिंस आगे बताते हैं कि मंदिर परिवेश के अंदर कार्यकारी ब्राह्मण (पुजारी) के लिये एक छोटा घर था तथा बाहर तीर्थयात्रियों के लिये लकड़ी का छायादार ढांचा था।






मौसम:


ग्रीष्म- दिन के समय सुहावना तथा रात में समय सर्द। न्यूनतम तापमान 6 सें. तथा अधिकतम 20 सें शीतकाल- सितंबर से नवंबर तक दिन के समय सुहावना, रात के समय अधिक ठंडा। दिसंबर से मार्च तक हिमाच्छादित। तापमान शून्य से कम
गंगोत्री अवस्था को एक नाम दिया जा सकता है- प्रेरणात्मक। नाटकीय परिदृश्यों में शामिल हैं ऊंचे बर्फीले शिखर जिसकी पृष्ठभूमि में हैं गहरी गढ़ी घाटियां जहां सिरों एवं देवदार के पेड़ों के बीच झिलमिलाती नदियों का आगमन होता है। यह भौतिक दृश्य एक जादू बिखेरता है। सदियों से यह लाखों तीर्थयात्रियों को आध्यात्मिक उत्साह तथा हजारों साहसिकों को एक चिरन्तर चुनौती देता रहा है।









स्थान:

समुद्र तल से 3,140 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गंगोत्री मंदिर भोज वृक्षों से घिरा तथा किनारे पर खड़े पर्वत की शिवलिंग, सतोपंथ जैसी चोटियों के साथ देवदार जंगल के बीच एक सुंदर घाटी है। भागीरथी घाटी के बाहर निकलकर केदारगंगा तथा भागीरथी के कोलाहल को छोड़कर जल गंगा से मिल जाती है, इस सुंदर घाटी के अंत में मंदिर है।












वनस्पतियां:

इस क्षेत्र में वनस्पतियों की विशाल प्रजातियां है। हिमालय का बलूत सर्वाधिक प्रमुख है। अन्य में शामिल हैं बुरांस, सफेद सरो (एवीज पींड्रो), स्वच्छ पेड़ (पाईसिया स्मिल बियाना), सदाबहार पेड़ (साईप्रेसस तरूलोस) तथा नीले देवदार आदि हैं। जब बलूत के पेड़ विलीन हो रहे होते है तो पैंगर (एसक्युलस ईडिका), कबासी (कोरिलस जैकुमोंटी), कंजुला (एसर कैसियम) तथा रींगाल (जानसेरेसिंस) इसकी जगह आ जाते हैं। परर्णांग, विसर्पी पौधे तथा शैवाक की यहां बहुतायत है।








जीवजन्तु:


इस क्षेत्र में पाये जाने वाले सामान्य जीव-जंतुओं में हैं लंगूर, लाल बंदर, भूरे भालू, सामान्य लोमड़ी, चीते, बर्फीले चीते, भोंकते हिरण सांभर, कस्तूरी मृग, सेरो, बरड़ मृग, साही, तहर आदि। विभिन्न रंगों की तितलियां तथा कीटें भी यहां पायी जाती हैं। गढ़वाल क्षेत्र रंगीन एवं संगीतमय जीव-जंतुओं से भरा पड़ा हैं। हिमालयी सीटी बजाती सारिकाएं, स्वणिर्म किरीटधारी, पाश्चात्य रंग-विरंगे हैसोड़, साखिएं मोनाल एवं कोकल तीतर, चक. ! 








स्थानीय लोग :

वेश-भूषा- अप्रैल से जुलाई तक हल्के ऊनी वस्त्र तथा सितंबर से नवंबर तक भारी ऊनी वस्त्र
तीर्थ-यात्रा का समय- अप्रैल से नवंबर तक.

भाषा- हिन्दी, अंग्रेजी तथा गढवाली।

आवास- गंगोत्री तथा यात्रा मार्ग में समस्त प्रमुख स्थानो पर जीएमवीएन यात्री विश्राम गृह, निजी विश्राम गृह तथा धर्मशालाए इत्यादि.!
  






निकटवर्ती आकर्षण:


गौमुख:

गंगोत्री से 19 किलोमीटर दूर3,892 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गौमुख गंगोत्री ग्लेशियर का मुहाना तथा भागीरथी नदी का उद्गम स्थल है। कहते हैं कि यहां के बर्फिले पानी में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं। गंगोत्री से यहां तक की दूरी पैदल या फिर ट्ट्टुओं पर सवार होकर पूरी की जाती है। चढ़ाई उतनी कठिन नहीं है तथा कई लोग उसी दिन वापस भी आ जाते है। गंगोत्री में कुली एवं ट्ट्टु उपलब्ध होते हैं।
25 किलोमीटर लंबा, 4 किलोमीटर चौड़ा तथा लगभग 40 मीटर ऊंचा गौमुख अपने आप में एक परिपूर्ण माप है। इस गौमुख ग्लेशियर में भगीरथी एक छोटी गुफानुमा ढांचे से आती है। इस बड़ी वर्फानी नदी में पानी 5,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक बेसिन में आता है जिसका मूल पश्चिमी ढलान पर से संतोपंथ समूह की चोटियों से है।







मुखबा गाँव :



भागीरथी के अलावा इस गांव के निवासी ही गंगोत्री मंदिर के पुजारी हैं जहां मुखीमठ मंदिर भी है। प्रत्येक वर्ष दीवाली में जब गंगोत्री मंदिर बंद होने पर जाड़ों में देवी गंगा को एक बाजे एवं जुलुस के साथ इस गांव में लाया जाता है। इसी जगह जाड़ों के 6 महीनों, बसंत आने तक गंगा की पूजा होती है जब प्रतिमा को गंगोत्री वापस लाया जाता है।
केदार खंड में मुख्यमठ की तीर्थयात्रा को महत्वपूर्ण माना गया है। इससे सटा है मार्कण्डेयपुरी जहां मार्कण्डेय मुनि के तप किया तथा उन्हें भगवान विष्णु द्वारा सृष्टि के विनाश का दर्शन कराया गया। किंबदन्ती अनुसार इसी प्रकार से मातंग ऋषि ने वर्षों तक बिना कुछ खाये-पीये यहां तप किया।







भैरों घाटी:



धाराली से 16 किलोमीटर तथा गंगोत्री से 9 किलोमीटर भैरों घाटी , जध जाह्नवी गंगा तथा भागीरथी के संगम पर स्थित है। यहां तेज बहाव से भागीरथी गहरी घाटियों में बहती है, जिसकी आवाज कानों में गर्जती है। वर्ष 1985 से पहले जब संसार के सर्वोच्च जाधगंगा पर झूला पुल सहित गंगोत्री तक मोटर गाड़ियों के लिये सड़क का निर्माण नहीं हुआ था, तीर्थयात्री लंका से भैरों घाटी तक घने देवदारों के बीच पैदल आते थे और फिर गंगोत्री जाते थे। भैरों घाटी हिमालय का एक मनोरम दर्शन कराता है, जहां से आप भृगु पर्वत श्रृंखला, सुदर्शन, मातृ तथा चीड़वासा चोटियों के दर्शन कर सकते हैं।





 शेष जानकारी अगले  भाग  में जारी......

स्रोत : विकिपीडिया.

छाया चित्र :  भिन्न -भिन्न जगहों से संग्रहित !


संयोजन : देव नेगी.


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गुरुवार, 7 मार्च 2013

आधुनिकता की दौर में लुप्त होते उत्तराखण्ड के लोक वाद्ययन्त्र :



हमारा उत्तराखण्ड लोक सांस्कृ्तिक एवं परम्पराओं क गढ़ है। यहाँ भिन्न भिन्न प्रकार की लोक कलाओं पर आधारित सांस्कृ्तिक एवं आध्यात्मिक  विरासत की झलक मिलती है,  यहाँ समस्त देवी देवता वास  हैं इसी लिए  उत्तराखंण्ड को देव भूमि कहलाता है , यानि कि उत्तराखण्ड देवों का गढ़ भी है कई पवित्र स्थल,  धाम इत्यादि यहीं स्थित है, जिनके दर्शन हेतु हर वर्ष देश विदेश से लाखों श्रधालु यात्री यहाँ आते है। जिससे हमारी गौरवता का अंदाजा लगाया जा सकता है, परन्तु वर्तमान समय मे स्थिति कुछ दयनीय हो गयी है, समय के साथ साथ सब कुछ बदलने लग गया है, और साथ मे हम खुद बदलने लग गये है जिससे हमारी परम्परा हमारी संस्कृ्ति कहीं न कहीं पीछे छूटती जा रही है, और यह इस बात का संकेत देता है कि हमारा आने वाला समय कैसा होगा। हम समय के साथ साथ सब कुछ धीरे धीरे भूलते जा रहे है,  इसका सबसे मुख्य कारण है पलायन.! पलायन के साथ साथ हम अपनी लोकसंस्कृ्ति को भी पीछे छोड़ते जा रहे हैं, और धीरे धीरे हमारी संस्कृ्ति की धरातल की मूल जडों को उखाड़ते जा रहे हैं..! उनमे से कुछ चीजे हैं जिनका अस्तित्व अब समाप्ति की और बढ रहा है, मुख्य रूप से हमारे लोक संस्कृ्ति की शान हमारे लोकवाद्य यन्त्र, जिनके बिना सब कुछ अधूरा प्रतीत होता है और यह सच भी है, उत्तराखंण्ड के लोक संगीत का इतिहास बहुत समृ्द्ध रहा हैं, पर्वतीय लोक संगीत हमारी लोकसंस्कृ्ति विरासत का आईना है, उत्तराखण्ड मे अनेक प्रकार से गायन एवं वादन किया जाता है, जो दो क्षेत्रों में बंटा हुआ है, उसमे से एक है क्षेत्र गढ़वाल एवं दूसरा क्षेत्र  कुमाऊं,  जो मिलकर गढ़वालीकुमाउंनी संस्कृ्ति संयोजन बनता है! और इस संयोजन मे मुख्य भूमिका निभाते है हमारे लोकवाद्य यन्त्र,  परन्तु दु:ख इस बात का है कि धीरे धीरे ये वाद्य यन्त्र लुप्त होते जा रहे है, जिन से हमारे संस्कृ्त, सभ्यता एवं परम्परा की पहिचान है अगर वही लुप्त हो जायेंगे तो हमारे संस्कृ्ति कैसे बचेगी..? आज कल के इस चकाचौदं एवं दिखावे की नकली रोशनी मे कहीं न कही हम अपनी परम्परा एवं पारम्परिक रीती रिवाजों को पीछे छोडते जा रहे हैं,  कई पीडि़यों से चली आ रही परम्परा अब अपने अन्तिम चरण मे है, और इन परम्पराओं जिंदा रखने वाले लोकवादक औजी, दास, धौंसिया (हुड़किया), घटल्या, डौरिया, बादी आदि लोग भी प्रोत्साहन की कमी  के कारण धीरे धीरे लुप्त की कगार पर है !

एक नजर उत्तराखण्डी वाद्ययंत्र एव उनके उपयोगो पर :

उत्तराखण्ड मे मुख्य वाद्ययंत्र जो हमारी संस्कृति का आधार है वो इस प्रकार हैं:-  ढोल, दमौ (दमाऊ) , भौंकर, हुणका (हुड़का), डौंर-थाली, मुरुली, मशकबीन, (बीनबाजा),  जौंल्या मुरुली एवं रणसिंगा आदि !

उत्तराखण्ड के मुख्य लोक वाद्ययन्त्र :



1-  ढोल : - 


ढोल उत्तराखण्ड के वाद्य यंत्रों मे एक प्रमुख वाद्य यंत्र है, यह ताँबे या पीतल के धातु से बना हुआ एक गोल बक्से के आकार का होता है, जिसके दोनों और जानवरो की खाल से बने पर्दे (पूणे) लगाये जाते है, फिर उन दोनों को डोरी के माध्यम से कसा (बाँधा) जाता है..! ढोल को एक से तरफ लकडी़ की बनी छणी से और एक तरफ हाथ से बजाया जाता है.! ढोल हर शुभ एवं मंगल कार्यों में प्रयोग किया जाता है, बिना ढोल के कोई भी मंगल कार्य शुभ एवं सम्पूर्ण नहीं माना जाता है। शादियों एवं विशेष धार्मिक कार्यक्रमो में मुख्य रूप से बजाया जाता है,  इसको वाद्यित करने वालों को दास या औजी कहा जाता है..!






2. दमौ (दमऊ) :- 

दमौ ढोल के साथ बजाया जाता है,  ढोल एवं दमौ दोनो अलग अलग नहीं बजाये जाते है, क्योंकि इन दोनो के मिश्रण से ही धुन एवं ताल बनता है, इन दोनों के संयोग से 52 तलों का निर्माण किया जाता है,! दमौ भी ढोल की तरह धातु से निर्मित होता है, परन्तु इसका आकार अलग होता है, यह तसैले (कटोरे) के आकर का होता है , इसके उपर भी  जानवरों की खाल का पर्दा लगाया जाता है, जो चमडी़ के द्वारा कसा जाता है.!  यह वाद्यक दासों द्वारा बजाया जाता है..।



3.भौंकर :-  

भौंकर ताँबे धातु से बना एक वाद्य यंत्र है, यह लगभग 3-4 मीटर लम्बे आकृति का होता है,  पीछे से संकरा और आगे से चौडे़ आकृति के इस यंत्र को विशेष महोत्सवों पर बजाया जाता है, यह ढोल एवं दमौ के साथ में बजाया जाता है, यह कोई भी बजा सकता है।








4. हुणका (हुडका) :-


हुणका (हुडका) एक विशेष प्रकार का वाद्य यंत्र है, यह काठ (लकडी़) से बना विशेषाकृति का होता है,  इसके दोनो ओर चमडे़ से बने गोल झिल्ली (पर्दे) लगाये जाते है,  इसका उपयोग भिन्न-भिन्न उत्सवों 
मे किया जात है,  मूल रूप से देवी देवताओं के जागर एमं पौराणिक देवताओं की गाथओं में इसका उपयोग किया जाता है !  इसके साथ ताल मिलाने के लिए विशेष प्रकार की थाली का प्रयोग किया जाता है, हुडके की धुन बहुत ही मन मोहक होती है । इसके वाद्यक को धौसिया या हुड़किया कहते है..!


5. डौ़र - थाली :-

डौर और थाली उत्तराखण्ड के प्रमुख वद्य यंत्रों मे से प्रमुख यंत्र हैं,  डौर लकडी़ का बना एक गोलाकार का बक्सा होता है जिसे दोनों तरफ से बजाया जाता है एक तरफ लकडी के बने विशेष प्रकार की छ्डी़ से और दूसरी तरफ हाथ से, डौंर के चारों तरफ बडे आकार के विशेष प्रकार के पीतल के गुंगरू लगाये जाते है जो धुन को और भी मनोनित करते है,  डौर- थाली का जागरों मांगलिक कार्यो एवं लोक पौराणिक देवताओं की गाथाओं मे प्रयोग किया जाता है, डौर के साथ थाली का तालमेल जरूरी होता है डौर और थाली दोनो एक साथ बजाये जाते है !  इन वाद्य यंत्रो को  बजाने वालो को हर जगह अलग अलग नाम से पुकारा जाता है, एक  स्थनीय भाषा अनुसार इनको घटल्या नाम से जाना जाता है ।





6. मशकबीन :-

मशकबीन उत्तराखण्डी वाद्य यंत्रो मे से एक प्रमुख वाद्य यंत्र है, यह खास कर शादियों मे शुभ अवसर पर बजाया जाता है,  इसमें एक साथ कई सुरों का समावेश होता है,  यह एक खास तरह का खाली ब्लाडर (थैला) की तरह होता है, इसमे अपने मुंह मे माध्यम से वायु का संचार किया जाता है,  यह वायु संचार जब का पूरा होती ही ब्लाडर फुल हो जाता है और इससे जुडें यंत्रो मे वायु का संचार होने लगता है  और फिर मधुर धुन का आवागमन होता है,




7. जौल्या (जौयां) मुरुली :- 

गढवाल एवं कुमाऊं मे बजाये जाने वाली ज्योलयां मुरुली उत्तराखण्डी वाद्य यंत्रो मे से प्रमुख यंत्र है, गढ़वाल एवं कुमाउं में जौंया का मतलब जुड़वा होता है,  यह दो सामान्य रिंगाल के नलियों को मिलाकर बनाया जाता है फिर इनमें अलग अलग छेद किये जाता है हर एक मे एक बडा़ एवं पाँच छोटे-छोटे छेद किये जाते है।  ऊंचाई क्षेत्रों मे पाये जाने वाले उत्तराखण्डी बाँस "रिंगाल" से निर्मित इस मुरुली को बजाने के लिए एक सामान्य मुरुली के अपेक्षाकृ्त ज्यादा सुर एवं स्वाश की आवश्यक्ता होती है।  इसमें सात सुरों की जगह सिर्फ पाँच धुनो का समावेश होता है, यह आम तौर पर कोई भी बना सकता है परन्तु  हर किसी वाद्यक से बजना मुश्किल होता है,  इसके लिए साँसो का निरन्तर प्रवाह जरूरी होता है, जो कि थोडा सा कठिन होता है,  इस विशेष वाद्य यंत्र को पहाडी़ क्षेत्रों के स्थानीय लोग, ग्वाले जंगलों में गायों के साथ लोक गीतों के तर्ज पर बजाते है जिसकी धुन मन को मुघ्ध कर देने वाली होती है ।



8. रणसिंगा :


रणसिंगा उत्तराखण्ड का एक प्रमुख वाद्य यंत्र है, यह आम तौर पर शुभ कार्यों के आरम्भ में वाद्यित किया जाता है..यह ताँबे के धातु से निर्मित किया जाता है, इसका एक छोर पतला एव दुसरा मोटा होता है..! इसका आकार नीचे से थोडा़ सीधा एवं उपर की ओर से  थोडा घुमावदार होता है ! हमारी विडम्बना देखिए आज के इस आधुनिकता के दौर में हम अपनी परम्परा, संस्कृ्ति-सभ्यता, रीति-रिवाज,   सब कुछ भूलते जा रहे है, यह बहुत दु:ख की बात है,  इस बारे मे गहरे चिन्तन की शक्त आवश्यक्ता है ।




 हमारी विडम्बना देखिए आज के इस आधुनिकता के दौर में हम अपनी परम्परा, संस्कृ्ति-सभ्यता, रीति-रिवाज,   सब कुछ भूलते जा रहे है, यह बहुत दु:ख की बात है,  इस बारे मे गहरे चिन्तन की शक्त आवश्यक्ता है।



धन्यवाद..!!


 छाया चित्र :  भिन्न -भिन्न जगहों से संग्रहित !

© देव नेगी 


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सोमवार, 4 फ़रवरी 2013


श्री केदार नाथ जी:


केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम  और पंच केदार  में से भी एक है। यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्‍य ही दर्शन के लिए खुलता है। पत्‍थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है। आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया। 



श्री केदार नाथ जी

महिमा व इतिहास:

केदारनाथ की बड़ी महिमा है। उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनो के दर्शनों का बड़ा ही माहात्म्य है। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनापथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश पूर्वक जीवन मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है।
इस मन्दिर की आयु के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, पर एक हजार वर्षों से केदारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा रहा है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसा ये १२-१३वीं शताब्दी का है। ग्वालियर से मिली एक राजा भोज स्तुति के अनुसार उनका बनवाय हुआ है जो १०७६-९९ काल के थे।  एक मान्यतानुसार वर्तमान मंदिर ८वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा बनवाया गया जो पांडवों द्वारा द्वापर काल में बनाये गये पहले के मंदिर की बगल में है। मंदिर के बड़े धूसर रंग की सीढ़ियों पर पाली या ब्राह्मी लिपि में कुछ खुदा है, जिसे स्पष्ट जानना मुश्किल है। फिर भी इतिहासकार डॉ शिव प्रसाद डबराल मानते है कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं। १८८२ के इतिहास के अनुसार साफ अग्रभाग के साथ मंदिर एक भव्य भवन था जिसके दोनों ओर पूजन मुद्रा में मूर्तियाँ हैं। “पीछे भूरे पत्थर से निर्मित एक टॉवर है इसके गर्भगृह की अटारी पर सोने का मुलम्मा चढ़ा है। मंदिर के सामने तीर्थयात्रियों के आवास के लिए पण्डों के पक्के मकान है। जबकि पूजारी या पुरोहित भवन के दक्षिणी ओर रहते हैं। श्री ट्रेल के अनुसार वर्तमान ढांचा हाल ही निर्मित है जबकि मूल भवन गिरकर नष्ट हो गये, केदारनाथ मन्दिर रुद्रप्रयाग जिले मे है उत्तरकाशी जिले मे नही



मंदिर वास्तुशिल्प :

यह मन्दिर एक छह फीट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। मन्दिर में मुख्य भाग मण्डप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मन्दिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन हाँ ऐसा भी कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी।
मन्दिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। प्रात:काल में शिव-पिण्ड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है। इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं। केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं।


यह  भगवान केदर नाथ जी की दुर्लभ
फोटो कई साल पुरानी है सच में इस फोटो
के दर्शन होते ही खुद को धन्य महसूस होता है

पौराणिक  कथा :

इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।
पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतध्र्यान हुए, तो उनके धड से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदारकहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं।



स्थिति :

चौरीबारी हिमनद के कुंड से निकलती मंदाकिनी नदी के समीप, केदारनाथ पर्वत शिखर के पाद में, कत्यूरी शैली द्वारा निर्मित, विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर (३,५६२ मीटर) की ऊँचाई पर अवस्थित है। इसे १००० वर्ष से भी पूर्व का निर्मित माना जाता है। जनश्रुति है कि इसका निर्माण पांडवों या उनके वंशज जन्मेजय द्वारा करवाया गया था। साथ ही यह भी प्रचलित है कि मंदिर का जीर्णोद्धार जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने करवाया था। मंदिर के पृष्ठभाग में शंकराचार्य जी की समाधि है। राहुल सांकृत्यायन द्वारा इस मंदिर का निर्माणकाल १०वीं व १२वीं शताब्दी के मध्य बताया गया है। यह मंदिर वास्तुकला का अद्भुत व आकर्षक नमूना है। मंदिर के गर्भ गृह में नुकीली चट्टान भगवान शिव के सदाशिव रूप में पूजी जाती है। केदारनाथ मंदिर के कपाट मेष संक्रांति से पंद्रह दिन पूर्व खुलते हैं और अगहन संक्रांति के निकट बलराज की रात्रि चारों पहर की पूजा और भइया दूज के दिन, प्रातः चार बजे, श्री केदार को घृत कमल व वस्त्रादि की समाधि के साथ ही, कपाट बंद हो जाते हैं। केदारनाथ के निकट ही गाँधी सरोवर व वासुकीताल हैं। केदारनाथ पहुँचने के लिए, रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी होकर, २० किमी. आगे गौरीकुंड तक, मोटरमार्ग से और १४ किमी. की यात्रा, मध्यम व तीव्र ढाल से होकर गुज़रनेवाले, पैदल मार्ग द्वारा करनी पड़ती है।
मंदिर मंदाकिनी के घाट पर बना हुआ हैं भीतर घारे अन्धकार रहता है और दीपक के सहारे ही शंकर जी के दर्शन होते हैं। शिवलिंग स्वयंभू है। सम्मुख की ओर यात्री जल-पुष्पादि चढ़ाते हैं और दूसरी ओर भगवान को घृत अर्पित कर बाँह भरकर मिलते हैं, मूर्ति चार हाथ लम्बी और डेढ़ हाथ मोटी है। मंदिर के जगमोहन में द्रौपदी सहित पाँच पाण्डवों की विशाल मूर्तियाँ हैं। मंदिर के पीछे कई कुण्ड हैं, जिनमें आचमन तथा तर्पण किया जा सकता है।

श्री केदार नाथ  मन्दिर 


दर्शन का समय:

केदारनाथ जी का मन्दिर आम दर्शनार्थियों के लिए प्रात: 7:00 बजे खुलता है।
दोपहर एक से दो बजे तक विशेष पूजा होती है और उसके बाद विश्राम के लिए मन्दिर बन्द कर दिया जाता है।
पुन: शाम 5 बजे जनता के दर्शन हेतु मन्दिर खोला जाता है।
पाँच मुख वाली भगवान शिव की प्रतिमा का विधिवत श्रृंगार करके 7:30 बजे से 8:30 बजे तक नियमित आरती होती है।
रात्रि 8:30 बजे केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मन्दिर बन्द कर दिया जाता है।
शीतकाल में केदारघाटी बर्फ़ से ढँक जाती है। यद्यपि केदारनाथ-मन्दिर के खोलने और बन्द करने का मुहूर्त निकाला जाता है, किन्तु यह सामान्यत: नवम्बर माह की 15 तारीख से पूर्व (वृश्चिक संक्रान्ति से दो दिन पूर्व) बन्द हो जाता है और छ: माह बाद अर्थात वैशाखी (13-14 अप्रैल) के बाद कपाट खुलता है।
ऐसी स्थिति में केदारनाथ की पंचमुखी प्रतिमा को ‘उखीमठ’ में लाया जाता हैं। इसी प्रतिमा की पूजा यहाँ भी रावल जी करते हैं।
केदारनाथ में जनता शुल्क जमा कराकर रसीद प्राप्त करती है और उसके अनुसार ही वह मन्दिर की पूजा-आरती कराती है अथवा भोग-प्रसाद ग्रहण करती है।


पूजा का क्रम:

भगवान की पूजाओं के क्रम में प्रात:कालिक पूजा, महाभिषेक पूजा, अभिषेक, लघु रुद्राभिषेक, षोडशोपचार पूजन, अष्टोपचार पूजन, सम्पूर्ण आरती, पाण्डव पूजा, गणेश पूजा, श्री भैरव पूजा, पार्वती जी की पूजा, शिव सहस्त्रनाम आदि प्रमुख हैं। मन्दिर-समिति द्वारा केदारनाथ मन्दिर में पूजा कराने हेतु जनता से जो दक्षिणा (शुल्क) लिया जाता है, उसमें समिति समय-समय पर परिर्वतन भी करती है।

स्रोत: विकिपीडिया

संयोजन:  देव नेगी



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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

श्री बद्रीनाथ जी


जय बद्री नाथ जी
बद्रीनाथ मंदिर जिसे बद्रीनारायण मंदिर भी कहते हैं, अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बद्रीनाथ को समर्पित है। यह हिन्दुओं के चार धाम में से एक धाम भी है। ऋषिकेष से यह २९४ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है| 
ये पंच-बद्री में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बद्री, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

1 महत्व
2 कथा
3 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार
4 लोक कथा
5 बद्रीनाथ नाम की कथा
6 दर्शनीय स्थल
7 बाहरी कड़ियाँ

1. महत्व :

बदरीनाथ उत्तर दिशा में हिमालय की अधित्यका पर हिन्दुओं का मुख्य यात्राधाम माना जाता है। मन्दिर में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है। यह भारत के चार धामों में प्रमुख तीर्थ है। प्रत्येक हिन्दू की यह कामना होती है कि वह बदरीनाथ का दर्शन एक बार अवश्य ही करे। यहाँ पर शीत के कारण अलकनन्दा में स्नान करना अत्यन्त ही कठिन है। अलकनन्दा के तो दर्शन ही किये जाते हैं। यात्री तप्तकुण्ड में स्नान करते हैं। वनतुलसी की माला, चले की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

छोटे चार धाम:
1. बद्री नाथ 
2. केदार नाथ 
3. गंगोत्री 
4. यमुनोत्री,

2. कथा :

जय बद्री विशाल
बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। शंकराचार्य की प्रचारयात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए। शंकराचार्य ने अलकनन्दा से पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। तदनन्तर मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्तकुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।
मन्दिर में बदरीनाथ की दाहिनी ओर कुबेर की मूर्ति है। उनके सामने उद्धवजी हैं तथा उत्सवमूर्ति है। उत्सवमूर्ति शीतकाल में बरफ जमने पर जोशीमठ में ले जायी जाती है। उद्धवजी के पास ही चरणपादुका है। बायीं ओर नर-नारायण की मूर्ति है। इनके समीप ही श्रीदेवी और भूदेवी है।

3. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार :

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई। इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बद्रीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना। भगवान विष्णु की प्रतिमा वाला वर्तमान मंदिर 3,133 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और माना जाता है कि आदि शंकराचार्य, आठवीं शताब्दी के दार्शनिक संत ने इसका निर्माण कराया था। इसके पश्चिम में 27 किमी की दूरी पर स्थित बद्रीनाथ शिखर कि ऊँचाई 7,138 मीटर है। बद्रीनाथ में एक मंदिर है, जिसमें बद्रीनाथ या विष्णु की वेदी है। यह 2,000 वर्ष से भी अधिक समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान रहा है।


4. लोक कथा:

पौराणिक कथाओं और यहाँ की लोक कथाओं के अनुसार यहाँ नील कंठ पर्वत के समीप भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतरण किया। ये जगह पहले शिव भूमि (केदार भूमि) के रूप में व्यवस्थित थी। भगवान् विष्णु जी अपने ध्यान योग हेतु स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा के समीप ये जगह बहुत भायी। उन्होंने चरणपादुका(नील कंठ पर्वत के समीप) बाल रूप में अवतरण किया और ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के समीप क्रंदन करने लगे। उनका रुदन सुन कर माता पार्वती का ह्रदय द्रवित हो उठा और वो और शिव जी स्वयं उस बालक के समीप उपस्थित हो गए। माता ने पुछा की बालक तुम्हे क्या चहिये? तो बालक ने ध्यान योग करने हेतु वो जगह मांगी। और इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती से वो जगह अपने ध्यान योग हेतु प्राप्त की। जो जगह आज बद्रीविशाल के नाम से सर्व विदिद है।
श्री बद्री नाथ जी

 5. बद्रीनाथ नाम की कथा:

जब भगवान विष्णु योग ध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो बहुत ही ज्यादा हिम पात होने लगा। भगवान विष्णु बर्फ में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का ह्रदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बेर(बद्री) के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगी। भगवान विष्णु को धुप वर्षा और हिम से बचने लगी। कई वर्षों बाद जब भगवान् विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा की माता लक्ष्मी बर्फ से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा की हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा। और क्यूंकि तुमने मेरी रक्षा बद्री रूप में की है सो आज से मुझे बद्री के नाथ-बद्रीनाथ के नाम से जाना जायेगा। इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बद्रीनाथ पड़ा।
जहाँ भगवान बद्री ने तप किया तह वो ही जगह आज तप्त कुण्ड के नाम से जानि जाती है और उनके तप के रूप में आज भी उस कुण्ड में हर मौसम में गर्म पानी उपलब्ध रहता है।
 

6. दर्शनीय स्थल :


बद्रीनाथ में तथा इसके समीप अन्य दर्शनीय स्थल हैं-

अलकनंदा के तट पर स्थित गर्म कुंड- तप्त कुंड.
धार्मिक अनुष्टानों के लिए इस्तेमाल होने वाला एक समतल चबूतरा- ब्रह्म कपाल.
पौराणिक कथाओं में उल्लिखित सांप(साँपों का जोड़ा).
शेषनाग की कथित छाप वाला एक शिलाखंड – शेषनेत्र.
चरणपादुका- जिसके बारे में कहा जाता है कि यह भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं, (यहीं भगवान विष्णु ने बालरूप में अवतरण किया था। )
बद्रीनाथ से नज़र आने वाला बर्फ़ से ढंका ऊँचा शिखर नीलकंठ, जो 'गढ़वाल क्वीन' के नाम से जाना जाता है।
माता मूर्ति मंदिर:- जिन्हें बद्रीनाथ भगवान जी की माता के रूप में पूजा जाता है।
माणा गाँव: इसे भारत का अंतिम गाँव भी कहा जाता है।
वेद व्यास गुफा,गणेश गुफा: यहीं वेदों और उपनिषदों का व्याख्यान और लेखन हुआ था।
भीम पुल: भीम ने सरस्वती नदी को पार करने हेतु एक भरी चट्टान को नदी के ऊपर रखा था जिसे भीम पुल के नाम से जाना जाता है।
तप्त कुंड
वसु धारा: यहाँ अष्ट वसुओं ने तपस्या की थी। ये जगह माणा से ८ किलोमीटर दूर है। कहते हैं की जिसके ऊपर इसकी बूंदे पड़ जाती हैं उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वो पापी नहीं होता है।
लक्ष्मी वन: ये वन लक्ष्मी माता के वन के नाम से प्रसिद्ध है।
सतोपंथ(स्वर्गारोहिणी): इसी जगह से राजा युधिष्ठिर सदेह स्वर्ग को प्रस्थान किये थे।
अलकापुरी: अलकनंदा न उद्गम स्थान। इसे धन के देवता कुबेर का भी निवास स्थान माना जाता है।
सरस्वती नदी: पूरे भारत में सिर्फ माणा गाँव में ही ये नदी प्रकट रूप में है।
भगवान विष्णु के तप से उनकी जंघा से एक अप्सरा उत्पन्न हुई जो उर्वशी नाम से विख्यात हुई। बद्रीनाथ कसबे के समीप ही बामणी गाँव में उनका मंदिर है।



नर नारायण पर्वत

7 बाहरी कड़ियाँ :

एक विचित्र सी बात है... जब भी आप बद्रीनाथ जी के दर्शन करें तो उस पर्वत(नारायण पर्वत) की चोटी की और देखेंगे तो पाएंगे की मंदिर के ऊपर पर्वत की चोटी शेषनाग के रूप में व्यवष्ठिथ है। शेष नाग के प्राकर्तिक फन साफ़ साफ़ देखे जा सकते हैं।





स्रोत : विकिपीडिया

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शनिवार, 15 दिसंबर 2012

बुराँस :( पहाडों का गुलदस्ता)


बुराँश 
बुराँस उत्तराखण्ड का प्रमुख पुष्प है, यह उत्तराखण्ड के  हिमालयी क्षेत्रों में 2000 से 3500 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है । बुराँस के पेड़ों पर मार्च-अप्रैल माह में लाल रंग के बहुत सुन्दर  फूल खिलते हैं, इनकी सुन्दरता मन मे एक अलौकिक शांति प्रदान करती है, एवं  मन को मोह लेती हैं, बुराँस के पेड़ जमीनी सतह से लगभग 8-15 मीटर तक लम्बे होते है, बुराँस के पेड़ की बनावट कुदरती तौर पर कुछ इस तरह से होती है जैसे मनो कि कोई गुलदस्ता हो,  नीचे से पेड़ संकरा एवं चिकना होता है, और उपर जाते जाते सुन्दर फूलों के साथ फैल जाता है,  इसे पहाडो़ का गुलदस्ता भी कह सकते है।. बुराँस के  पेडों की पत्तियां बनावटी तौर पर दूसरे पेडों की पत्तियों से बिलकुल अलग होती है, इसकी पत्तियों की बनावट भिन्न प्रकार की होती है, इसकी पत्तियां दूसरे पौधों के मुकाबले लम्बी एवं ठोस होती है.,  इसके वृ्क्ष की बनावट भी सबसे अलग होती है..! पर अब जिस तरह से जंगलो का दोहन हो रहा है एवं प्रदूषण बढ़ रहा है, इससे हमारे जंगलो का सतित्व खतरे में है,  इस धरा पर प्रकृ्ति ने इंसानो को  न जाने कितने रूपों में अनमोल भेट प्रदान किये है, पर इंसान इसकी महता को नहीं पहिचान पा रहा है,  अब स्थिति ये है कि धीरे धीरे हमारी प्रकृ्तिक सम्पदा पतन की और बढ़् रही हैं चीजें लुप्त होती जा रही है ये हम सब प्राणी मात्र के लिए बहुत चिंता क विषय बना हुआ है।


बुराँस का उपयोग :

  बुराँस का प्रयोग अनेकों रूपों से किया जाता है, साथ ही जंगलो में बुराँस का पेड़ विषेश महत्व रखता है, पर्वतीय क्षेत्रों में पेयजल स्त्रोतों को यथावत रखने में बुराँस महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्राकृ्तिक संपदा के रूप में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।अगर औषधी के रूप मे देखा जाए तो यह बहुत ही प्रयोगशाली सिद्ध हुआ है,  बुरांस का प्रयोग  भिन्न प्रकार के औषधियों मे किया जाता है,  इससे निर्मित औषधियां बडीं ही लाभकारी होती है, बुरांस के पुष्प का रस भी निकाला जाता है, यह अनेक बीमारियों मे भी लाभकारी है। पहाडी़ गाँवों मे स्थानीय लोग जंगल से बुराँस ले कर इसका शरबत  (जूश) निकाल लेते है,  एक तरफ से इसको अब कई लोगों का आय का साधन भी माना जाता है, पहाडी़ क्षेत्रों में गाँवों के लोग पेडों से बुराँस को निकाल कर बजार मे बेचते है जिससे उनको उसके बदले मे  आंशिक रूप से कुछ पैसा मिल जाता है, जिससे उनको आर्थिक रूप से कुछ सहायता मिल जाती है, और बाजार मे जा कर बुराँस से निर्मित कई वस्तुएं कई गुना  महंगे दामों मे हमारे सम्मुख प्राप्त होती है..!  इनमे से शरबत एवं औषधियाँ प्रमुख है,  बुराँश का शरबत हृ्दय रोगियों के लिए लाभकारी माना जाता है ! बुराँश सिर्फ मनुष्यों के लिए ही नहीं बल्कि अन्य जीवों के लिए भी उपयोगी है, इनमे से प्रमुख है मधुमक्खी, जी हाँ, मधुमक्खी को बुराँश का फूल सबसे ज्यादा पसन्द  हैं..! वह सबसे ज्यादा बुराँश के फूल का रस लेती है. क्योंकि वह आसानी से मिल जाता है, फिर मधुमक्खी इस रस से शहद का निर्माण करती है, परन्तु यह शहद आसानी से प्राप्त नहीं होता, क्योकि इसका स्रोत अधिकतर जंगलो या आस पास के ग्रामीण क्षेत्रों मे मिलता है, यह शहद बहुत ही उपयोगी होता है।   प्रकृ्ति के इस अनमोल देन में एक और खूबी होती है, बुराँश के फूलों की पंखुडियों में एक तरह का रस पाया जाता है  जो बहुत ही स्वादिष्ट एवं मीठा होता है, कई लोग कभी कभी इसके साथ बुराँस की पखुंडियों को भी खा जाते हैं.! साथ ही बुराँस कई अन्य प्रकार से भी उपयोगी है ! सूख जाने पर इसकी पतियाँ काफी काम आती है, गाँव के लोग इसकी पतियों को समेट कर घर लाते है, और इसे अपने पालतू जानवरों ( गाय, भैस ) के गौशालाओं मे डाल कर गौबर के रूप में खाद बना लेते है,  यह  सर्वोत्तम खाद माना जाता है जो  उपजाव भूमि एवं फसल के लिए बहुत उपयोगी है,  इससे खेतों मे फसल की पैदावार भी बहुत अच्छी होती है। बुराँस की लकडियां भी बहुत काम आती है,  इसकी  लकड़ी का इस्तेमाल भिन्न प्रकार के कृषि यंत्रों के हत्थे बनाने में किया जाता है। और साथ ही ग्रामीण लोग इसकी लकडीं का उपयोग खाना बनानें मे भी करते है। यह प्रकृ्तिक का ही चमत्कार है जो एक पेड़ बुराँश में इतने सारे गुण भरे हुए है, और इतना उपयोगी है।धन्यवाद..!



© देव नेगी



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शनिवार, 8 दिसंबर 2012

श्री गोपीनाथ मन्दिर गोपेश्वर (उत्तराखण्ड):


श्री गोपीनाथ मन्दिर 

भगवान  गोपीनाथ जी का यह  मन्दिर उत्तराखण्ड के चमोली क्षेत्र के गोपेश्वर नामक शहर में स्थित एक प्राचीन हिन्दू मंदिर है।  भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भारत के प्रमुख रमणीय स्थलों मे से एक है।  इस पवित्र स्थल के दर्शन मात्र से ही भक्त अपने को धन्य मानते हैं, एवं भग्वान सारे भक्तों के समस्त कष्ट दूर कर देते  हैं,  गोपीनाथ मंदिर केदारनाथ मंदिर के बाद सबसे प्राचीन मंदिरों की श्रेणी में आता है. यहाँ पर मिले भिन्न प्रकार के पुरातत्व एवं शिलायें इस बात को दर्शाते है कि यहं मन्दिर कितना पौराणिक है, मन्दिर के आस पास, माँ दुर्गा, श्री गणेश एवं श्री हनुमान जी के मन्दिर हैं, जो भक्तों को और भी आनन्दमय एवं श्रद्धा से परिपूर्ण करते है,
भगवान गोपीनाथ जी के इस मन्दिर का दर्शन चार धाम यात्रा करने वाले श्रद्धालू चमोली से केदारनाथ यात्रा के दौरान गोपेश्वर में कर सकते है। भव्य शिलाओं       से बने इस मंदिर का निर्माण और वास्तुकला का स्वरूप सभी को आकर्षित करता है. पौराणिक महत्व लिए गोपीनाथ मंदिर शैव मत के साधकों का प्रमुख तीर्थ स्थल है. गोपेश्वर आने वाले तीर्थ यात्री गोपीनाथ मंदिर के दर्शन करना नहीं भूलते।

गोपीनाथ मन्दिर की पौराणिकता :

गोपेश्वर में स्थित भगवान शिव के मन्दिर गोपीनाथ को लेकर विभिन्न धार्मिक एवं पौराणिक तथ्य है,  पुराणों से इस जगह के बारे में  ज्ञात होता है कि यह स्थल भगवान शिव की तपोस्थली थी, यहाँ पर भगवान शिव ने अनेक वर्षों तक तपस्या की तथा भगवान शिव द्वारा कामदेव को इसी स्थान पर भस्म किया गया था, कहा जाता है कि सती के देह त्याग के पश्चात जब भगवान शिव तप में लीन हो गए थे,  तब ताड़कासुर नामक राक्षस ने तीनों लोकों में हा हा कार  मचा रखा था, तथा कोई भी उसे हरा नहीं पाया तब ब्रह्मा के कथन अनुसार शिव का पुत्र ही इसे मार सकता है. सभी देवों ने भगवान शिव की आराधना करनी शुरू कर दी परन्तु शिव अपनी तपस्या से नहीं जागे इस पर इंद्र ने कामदेव को यह कार्य सौंपा ताकी भगवान शिव तपस्या को समाप्त करके देवी पार्वती से विवाह कर लें और उनसे उत्पन्न पुत्र ताड़कासुर का वध कर सके।
इसी वजह से इंद्र ने कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने भेजा और जब कामदेव ने भगवान शिव पर अपने काम तीरों से प्रहार किया तो भगवान शिव की तपस्या भंग हो गई तथा शिव ने क्रोधित हो कामदेव को मारने के लिए अपना त्रिशूल फेंका तो वह त्रिशूल इस स्थान पर गढ़ गया जहाँ पर वर्तमान में गोपीनाथ जी का मंदिर स्थापित है, इसके अतिरिक्त एक अन्य कथा अनुसार यहां पर राजा सगर का शासन था. इसी राजा के नाम से आज भी यहाँ गोपेश्वर के निकट एक गाँव जिसका नाम सगर है, कहते हैं कि उस समय एक विचित्र घटना घटी एक गाय जो प्रतिदिन इस स्थान पर आया करती थी तथा उसके स्तनों का दूध स्वत: ही यहां पर गिरने लगता जब राजा को इस बात का पता चला तो राजा ने सिपाहियों समेत उस गाय का पीछा किया संपूर्ण घटनाक्रम को देखकर राजा के आश्चर्यचकित गहो गया जहाँ गाय के दूध की धारा स्वतः ही बह रही थी वहाँ पर एक शिव लिंग स्थापित था,  इस पर राजा ने उस पवित्र स्थल पर मन्दिर का निर्माण किया।

पौराणिक त्रिशूल :

श्री गोपी नाथ मंदिर के दर्शन एवं परिक्रमा करने के बाद बाँयी तरफ श्री हनुमान जी के मन्दिर के सामने एक विशाल त्रिशूल है,  मंदिर के दर्शन के बाद त्रिशूल के दर्शन एवं परिक्रमा करने प्रवधान है   मान्यताओं के अनुसार जब भगवान शिव ने कामदेव को मारने के लिए अपना त्रिशूल फेंका तो वह यहाँ गढ़ गया। त्रिशूल का धातु अभी भी सही स्थित में है, त्रिशूल की धातु का सही ज्ञान तो नहीं हो पाया है परंतु इतना अवश्य है कि यह अष्ट धातु का बना होगा,  जिस पर मौसम भी प्रभावहीन है और यह आज के युग में एक आश्वर्यजनक बात है।  यह भी माना जाता है कि शारिरिक बल से इस त्रिशुल को हिलाया भी नहीं जा सकता, जबकि यदि कोई सच्चा भक्त इसे उंगली से भी छू भी ले तो इसमें कम्पन होने लगता है। श्रद्धा के सागर मे बहने वाले भक्त यहाँ अपनी भक्ती की आजमाइस जरूर करते है!

गोपीनाथ मन्दिर महत्व :

भगवान  गोपीनाथ जी के इस मन्दिर का महत्व बहुत ही विशेष है। हर रोज सैकडो़  श्रद्धालू यहाँ भगवान के दर्शनार्थ आते हैं,  इस मन्दिर  में शिवलिंग, परशुराम, भैरव जी की प्रतिमाएँ विराजमान हैं. मन्दिर  के निर्माण में भव्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है. मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंग स्थापित है मंदिर से कुछ दूरी पर वैतरणी नामक कुंड स्थापित है जिसके पवित्र जल में स्नान करने का विशेष महत्व है। सभी श्रद्धालू इस पवित्र स्थल के दर्शन प्राप्त करके  अपने को धन्य मानते हैं ।

धन्यवाद !

© देव नेगी


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सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

कीडा़जडी़ (Yarshagumba) यार्शागुम्बा



परिचय:
हमारी प्रकृ्ति प्राकृ्तिक संसाधनों एवं बनस्पतिक जडीं बूटियों का भण्डार है, जो प्राणियों को उपहार स्वरूप अनेकों प्रकार की जडी़ बूटियों के माध्यम से प्रदान करती है।  इन्हीं में से एक जडीं है कीड़ाजड़ी जो समुद्र तल से 3000 से 6200 मीटर की ऊंचाई वाले  पहाडि़यों (बुग्याली क्षेत्रों) में पायी जाती है।  कीडा़जडी़ एक बहुमूल्य,दुर्लब एवं अद्वितीय जडी़ है,  यह चीन, नेपाल, भूटान, तिब्बत , एवं भारत में उत्तराखंड के एवं अन्य बुग्यालों में पाया जाता है,  यह सीजनल जडी़ है, बर्फ पिगलने के बाद नजर आता है और अप्रेल से जुलाई के बीच में निकाला जाता है,  इसका आकार  बिलकुल कीडे़ की तरह होता है, वनस्पति शास्त्रियों एवं कीट विज्ञानियों के अनुसार यह कवक (फफूंद) की एक प्रजाति है। इसके बारे में यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि यहा बनस्पति है या जीव जन्तु, यह आधी बनस्पति एवं आधा कवक, बफफूंदी के प्रजाती के रूप मे पाया जाता है।  कीडा़ जडी सामान्यत: पनस्पति एवं परजीवी कवक, नरंगी पीली झिल्ली का एक असाधारण संयोजन है, इसका अन्दर का भाग सफेद होता है, इसकी संरचना स्प्रिंग की तरह घुमावदार होता है, जो जमीन के अंदर और बाहर पाया जाता है जमीन के अन्दर कीडे़ के आकर की जडी़ एवं जमीन से बाहर इसका तना होता है,  इनके बारे मे सबके अपने अपने अलग अलग मत है.. कई लोगो के अनुसार कीडा़ जडी़ एक तरह का परजीव है जो कवक के रूप मे पाया जाता है और पहाडो़ मे फर्फवारी के दौरान भूमिगत हो जाता है, और कई लोगों के अनुसार यह सय़ोजन है परजीवी कीटों का जो भूमिगत होते है और बर्फबारी के दौरान या बाद मे पैदा होते है, और गर्मी आने पर भूमि के उपर का भाग गर्मी के कारण सूख जाते है, भूमिगत जड़ कीडा़जडी के रूप मे प्राप्त होता है। जिसको वैज्ञानिक दृष्टि से कार्डिसेप्स सायनेंसिस (cordyceps sinensis) के नाम से वर्गीकृत किया जाता है। और इसको अंग्रेजी में (caterpillar fungus) कमला कवक या फफूंदी कहा जाता है। सर्वप्रथ इसका उल्लेख तिब्बतियों द्वारा किया गया, तिब्बती यसलाई भाषा में इस जडी़ को यार्शकुन्भु एवं यार्शागुन्बु बोलते है , जिसका अर्थ इस प्रकार है :- "यार" का मतलब होता है वर्षा एवं "शा" का मतलब घास (बनस्पति), कुन्भु का मतलब होता है कीडा़, अर्थात वर्षा ऋतु में उगने वाला एक प्रकार का पनस्पतिक कीडा़। यार्शा गुम्बा हिमालयी क्षेत्र में पायी जाने वाली एक विशेष प्रकार की एक औषधी  है  जो एक कीड़े के जीवन चक्र का अद्भुभुत संयोग का परिणाम है।

कीडा़ जडी़ के प्रकार (प्रजातियां):

कीडे़ के समान दिखाई देने वाली "कीडा़जडी" अनेक प्रकार की होती है, इनकी अलग अलग प्रजातियां होती है, पूरे विश्व में इनकी लगभग 100 से ज्यादा प्रजातियां पायी जाती हैं, जिनमें से भारत मे 70 से 75 प्रजातियां पायी जाती है, अन्य प्रजातियां चीन, नेपाल आदि देशों मे पायी जाती है ..!


आय का श्रोत :

कीडा़ जडी़ वैसे तो काफी समय से लोगो के जहन मे था, पर आज कल कुछ समय से कीडा़ का प्रचलन काफी जोरो सोरों से चल रहा है, पहले हमारे लोग कीडा़जडी के बारे मे कम जानते थे परन्तु कुछ समय से अब हर कोई कीडा़जडी़ के बारे मे जानने लगा है,  पहाडीं क्षेत्रों में कीडा़ जडी लोगो के जीवन के आय का मुख्य श्रोत बनता जा रहा है, दूर दूर स्थित गाँवों के लोग कई कई दिनों तक कीडा जडी के लिये जंगलो मे ही डेरा बना कर रहते है..!
कीडा़ जडी के सीजन में जंगलो मे कई हजार की आवादी में लोगो का जमावडा़ लगता है, साल भर सुनसान रहने वाले ये जंगल ये पहाडि़याँ कीडा़ जडी के सीजन मे पूरी तरह भर जाता है, इन लोगों को देख कर एसा प्रतीत होता है कि जैसे कोई मेला लगा हो और मेले में ये  सारे के सारे लोगो शामिल होने आये  है, दिन भर के कठिन परिश्रम करने के बाद किसी को कोई भी जडी़ नहीं मिलती और किसी को कई जडि़यां मिल जाती है, ये जडि़यां भूमिगत होने के कारण आसानी से नहीं दिखाई देते है, और कई परेशानियों का सामना करने के बाद जा कर जडि़यां कहीं दिखाई देते है, इस जडी़ को ढूँढने के लिये खुद को भूमिगत होना पड़ता है, अर्थात भूमि पर बहुत ही करीब से इस जडि़यों को ढूंडना पडता है, जब  कोइ सुई जमीन मे खो जाती है और उसे ढूँढ्ने मे जितनी मेहनत होती है उसी प्रकार की मेहनत कीडा़ जडी को ढूँडने में करनी पड़ती है, कई कई घंटो के मेहनत करने के बाद ही ये जडि़या मिलती है, और इनको ढूँढ्ने मे आँखे भी दुखने लगती है।

व्यापार (कारोबार): 

इन जडि़यों को खरीदने के लिए कई सौकार (व्यापारी ) साथ मे हीं जंगकलों मँ अपना डेरा जमाए रहते है, क्योंकि वहाँ उनको जडियां सस्ती और आसानी  से प्राप्त हो जाती है, जैसे ही दिन मे लोग जडि़यां निकाल कर अपने डेरे पर जाते है तो खरीददार वहीं जडों को खरीदने पहुँच जाते है, जंगलो मे ही यह जडी़ 100-170 रूपये प्रति जडी़ बिकती है, इस जडी़ को करीदने के लिए सरकार द्वारा अनुमति लेने की जरूरी होता है इसके लिए व्यापारी को  अनुज्ञापत्र (licence) की जरूरत होती है, इसके लिए इन व्यापारियों को सरकार को इस पर कर देना पड़ता है,  इस लिए कई छोटे मोटे व्यापारी चोरी चोरी इनका व्यापार करते है, जिसे आम बोलचाल की भाषा मे काला बाजारी कहते है, जो आज हमारे देश मे आधे से ज्यादा मात्रा में हो रहा है, आज यह एक समस्या के रूप मे उभर रही है।  कीडा़ जडी़ से इस समय मे कई लोगों आर्थिक रूप से बडे़ रूप मे सहायता मिल रही है,  दूर दराज के पहाडी गाँवो मे रोजगार की कमीं होने के कारण लोगों का रुझान इस तरफ बढ़ रहा है और रोजगार  का माध्यम, कीडा़ जडी बनता जा रहा है, लोगो को आसानी से आर्थिक मदद मिल जाती है, इसी लिए सीजन में गाँव के लोग अन्य कार्य छोड कर सुदूर कई मील पहाडों की ऊँचाईयो में कई कई दिनों के लिये सिर्फ कीडा़ जडी निकालने के लिए चले जाते है.!  कई छोटे व्यापारी  मोटी रकम कमाने के लिये  चोरी से इस जडी़ का व्यापार करते है जो कि अवैधानिक है, जिन्हे हम आम भाषा मे तस्करी भी बोला जाता है, कीडे़ जडीं का कारोबार आज  पूरे विश्व में जोरों से चल रहा है, इसका मुख्य कारण है इस जडीं द्वारा बनाए जाने वाले महंगी औषधियां, एवं अन्य तरह की सामग्री जिनकी माँग उच्च स्थर पर ज्यादा है, इस जडी़ की खुदरा बाजार में कीमत लगभग 10 से 20 लाख रूपये प्रति तक किलो है। जो पहले के मुकाबले में कई गुना ज्यादा है, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजार मे इसकी कीमत लगभग 25 से 35 लाख रुपये प्रति किलो तक है। कीडा़ जडी भारत से नेपाल के जरिये इस जडी़ का निर्यात होता है,..! और यहाँ से पूरे विश्व में अलग अलग जगह तक पहुँचाया जाता है।  फिर भिन्न प्रकार के उत्पादों मे प्रयोग करके उन्हें  दुगुने दामों मे बिकाया जाता है..! चीन, थाईलैंड, वियतनाम, कोरिया और जापान जैसे देशों में मांग सबसे अधिक है.!


उपयोग :

कीडा़ जडी से कई प्रकार की औषधियों का निर्माण किया जाता है,   कई प्रकार की जटिल बीमारोयों की दवाईयाँ इस जडी़ से बनाई जाती है, और कई रोगों के लिए लाभकारी है जो निम्नलिखित है.:-


1- अस्थमा के लिए
2- यह जडी़ यौनवर्धक मानी जाती है और इसके लिए औषधियाँ भी बनती है।
3- कई प्रकार के  तत्व, अनेक प्रकार के विटामिन इसमें उपलब्ध है।
4- हृदय,  यकृत तथा गुर्दे संबंधी व्याधियों में उपयोगी है
5- एलर्जी सम्बन्धी बीमारियों मे लाभकारी।
6- इससे कैंसर व दिल की बीमारी की दवा बनती
7- यारशा गम्बू से तैयार शक्तिवर्धक दवाओं का उपयोग खिलाडी़ करते हैं जिसका पता डोप टेस्ट में भी नहीं चल पाता है्। इस दवा का मुख्य तत्व सेलेनिम होता है जो एड्स, क्षय रोग, दर्द और ल्यूकेमिया आदि कई बीमारियों के इलाज में काम आता है। यह कैंसर कोशिकाओं के विखंडन को नियंत्रित करता है।

धन्यवाद..!

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 © देव नेगी


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सोमवार, 20 अगस्त 2012

"सप्तकुण्ड एक परिचय" :




सप्त्कुण्ड शायद आप लोगों को पहली बार ये नाम सुनाई दे रहा होगा, !!  हमारे देश मे ऎसे कई भव्य एवं प्राकृ्तिक सुन्दरता से भरे स्थान है जो लोगों की पहुँच से काफी दूर है, हमारे उत्तराखण्ड में ही कई अदभुत नजारे हैं. परन्तु आज भी ऎसे जगहों से हम अनजान है. एसे स्थानों में पर्याप्त  संसाधन न मिल पाने एवं प्रशासन की तरफ से कोई भी कदम न उठाए जाने के कारण सबकी पहुँच से काफी दूर रह जाते है,  एसे स्थान  देश के  ही नहीं बल्कि विदेशी पर्यटकों  का भी आकर्षण का केन्द्र होते है.. हमारे प्रशासन की जागरूकता की कमीं के कारण आज भी हिन्दुस्तान में कई जगह अछूते रह गये हैं।  क्योकि ऐसे जगहों पर या तो रोड नही होती है साथ में पर्याप्त साधन नही होते है. जिस कारण लोग एसे जगहों तक पहुंचने मे सफल  नही हो पाते है, एक मुख्य कारण है मीडिया से दूर होने के कारण कई इस प्रकार की हमारे देश की धरोहर पीछे रह जाती है।  हमको चाहिए कि हम खुद के छोटे से प्रयास से हमारे देश की एसे  अमूल्य धरोहरों को जितना हो सके देश एवं विदशों मे प्रचलित करें जिससे लोग हमारे देश को जान पाए, हमारे पहाड़ एवं संस्कृ्ति को समझ पाएं।
सोचिये अगर हमारे देश मे ऐसी जगह है जहाँ स्वर्ग बसता है.तो हमारा देश कितना महान है. अगर हम लोग अपना थोडा़ सा समय अपने देश की संस्कृ्ति विरासत एवं प्राकृ्तिक धरोहर के लिए निकालें तो यह हमारे एवं देश के लिये बहुत गौरव वाली बात होगी।

परिचय:-
सप्तकुण्ड एक धार्मिक एवं पर्यटक स्थल है यह भारत मे उत्तराखण्ड राज्य के चमोली जिले मे झींजी गाँव से लगभग २६ किमी. की दूरी पर पड़ता है।
सप्तकुण्ड जाने के लिए झींजी गाँव से हो कर मुख्य मार्ग जाता है सुरुवात  में घने जंगलो के बीच से  होते हुए चढाई का सामना करके धीरे धीरे पेडो़ की शीतल छाँव के साथ साथ कई उतार चढाव के बाद पहुँचा जाता है. यहाँ का दृष्य बड़ा ही सुन्दर है. यहाँ की सुन्दरता मन को मोह देने वाली है एवं पेड़ों कि ठन्डी छाँव पहाडो़ की सुन्दर श्रृखलाएं सुन्दर वादियां मन को मोह लेती है यहाँ की ठंडी हवायें, एसे लगता है जैसे कि पूरी पृथ्वी की सुन्दरता यहाँ आकर सिमट गयी हो..! यहाँ आने के बाद इन्सान अपने को भूल जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वर्ग मे आ गये है. पूरी तरह प्रकृति में खो जाता है! इस भाग दौड. की जिन्दगी मे इन्सान को अपने लिये वक्त नहीं होता है. परन्तु वहाँ इन्सान अपनी सारी परेशानिया भूल जाता है. और एक नयी जिन्दगी को महसूस करता है! सायद यही इन्सानो के लिये स्वर्ग है. जहां प्रकृति के सारे रंग नज़र आते है। और इस अनुभूति के साथ भी इस प्रकृ्ति के इस सुन्दर मनमोहक वदियों मे खो जाता है।
वैसे तो सप्तकुण्ड का वर्णन शब्दो मे माध्यम से नहीं किया जा सकता है पर फिर भी मै कोशिश करता हूँ, सप्त्कुण्ड सात कुण्डो का स्थल है. यहाँ सात बडे़ कुण्ड (झील) है जो बहुत ही मनोरम एवं अतिसुन्दर एवं अदभुत है. इन कुण्डों का धार्मिक मान्यताओं के आधार पर  अलग अलग स्तर पर विशेष महत्व है,  सप्तकुण्ड में पर्यटकों  के  साथ ही धार्मिक लोगो का भी आवगमन होता है, यहाँ कई दैवीय शक्तियों का भी स्थान है,   स्थानीय  गाँव के लोगो के द्वारा प्रति वर्ष यहाँ भगवान शिव एवं माँ पार्वती भगवती पूजा की जाती है. यहाँ मान्यता के अनुसार यहाँ भगवान शिव का वास स्थान है. यहाँ दैवीय शक्तियाँ निवास करती है. वहाँ जाने वालों को ये प्रतीत होता है. और लोगो को इसका अनुभव भी हो चुका है।
सप्त्कुण्ड जमीनी तल से लगभग २०००० फ़ुट की उंचाई पर, पीछे की और से त्रिशूल एवं नन्दा देवी से घिरा हुआ है, सप्तकुण्ड में  इतनी उंचाई पर सात कुण्डों का समूह  एक अजूबा लगता है। कहा गया है कि पुराणों मे भी यहाँ का वर्णन है,  फिर भी ये एक रहस्य बना हुआ है अभी तक ये किसी को पता नहीं  चल पाया है कि यहाँ की हकीकत क्या है. पर इतना तो जरूर है  एसे जगहों मे प्राकृ्तिक एवं दैवीय शक्तियों का वास होता है, सायद ये प्रकृति का ही चमत्कार है.! इस बारे मे और अधिक जानकारी  दूसरे संस्करण में दूँगा.!

सप्त्कुण्ड तक पहुचँने के लिये पहले कोई आसान मार्ग नही था..!. परन्तु अब वहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है, काफी मकसत के बाद आखिर में सन, २००३ में झींझी गाँव से मार्ग का निर्माण किया गया, वहाँ तक पहुंचने के लिये पैदल अथवा घोडे़ खच्चर भी उपलब्ध  होते है। और यहाँ जाने के लिये मई से नवम्बर तक अनुकूल मौसम होता है। धीरे-धीरे लोगो को यहाँ का पता चल रहा है. और कफी  लोगो का रुझान उदर की और बड़ रहा है. और लोग वहां जा रहे है।
सप्तकुण्ड जाने के लिये अगर दिल्ली से जाना है तो इस प्रकार जाना होगा :-
                                                                                                          (लगभग)
दिल्ली से हरिद्वार --------------- २१० किमी०  मोटर मार्ग.
हरिद्वार से ऋषिकेश --------------- २४ किमी०   मोटर मार्ग.
ऋषिकेश से देवप्रयाग --------------- ७० किमी०   मोटर मार्ग.
देवप्रयाग से श्रीनगर --------------- ३३ किमी०   मोटर मार्ग.
श्रीनगर से रूद्रप्रयाग --------------- ३६ किमी०   मोटर मार्ग.
रूद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग   -------------- ३१ किमी०   मोटर मार्ग.
कर्णप्रयाग से नन्दप्रयाग -------------- २१ किमी०   मोटर मार्ग.
नन्दप्रयाग से चमोली   -------------- १० किमी०   मोटर मार्ग.
चमोली से निजमुला   -------------- २० किमी०   मोटर मार्ग.
निजमुला से झीझी गाँव -------------- २२ किमी०   पैदल मार्ग.
झींझी से सप्तकुण्ड   -------------- २४ किमी०   पैदल मार्ग.

आशा करता हूँ कि आप यहाँ जरूर जायेंगे और आपको यह जगह बहुत पसन्द आयेगी। अगर कोई तुर्टि हुई हो तो उसके लिये मै छ्मा चाहूँगा मेरी पूरी कोशिश  रहेगी कि जो हमारे देश मे जो धरोहर है उनको दुनिया की सामने लाऊं लोगो से उनका परिचय करवाऊं. ताकि लोगों को भी पता चले हमारे देश मॆ ऎसे भी जगह जहाँ जाकर ऐसा प्रतीत हो कि सच मॆ हमारा देश सांस्कृतिक विरासत से परिपूर्ण एवं महान हैं। हमारे देश मे वो सब कुछ है जो दुनियाँ के और देशों मॆ नहीं है. हमको चाहिये को उनको ढूंड कर सबके सामने लायें! तभी हम अपने देश को दुनिया के देशो मॆ सबसे आगे ला सकते है! हम लोगो को बता सकें कि हमारा भारत महान है. सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान  हमारा!

धन्यवाद !!

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 © देव नेगी


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बलि प्रथा या कुप्रथा :



अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिये किसी की हत्या करना..! जी हाँ ये सच है अपने स्वार्थ के लिये देवी देवताओं के नाम पर आज भी कई जगह बली दी जाती है .पुराने समय से यह धारणा रही है कि बलियों के जरिये देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है। कुछ रूढ़िवादी लोगों और समूहों के द्वारा समाज में इस प्रकार की भ्रांतियां फैला दी जाती हैं। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि  एक निर्दोष  प्राणी की हत्या से कैसे ईश्वर  प्रसन्न हो सकते हैं, जबकि धरती का हर प्राणी ईश्वर  की ही देन है।  एक तरफ कहा जाता है कि हत्या करना पाप है और दूसरी तरफ अपने पापों और बुरे कर्मों के आड़ मे पाप पर पाप करते जाते है.  जब ईश्वर सबको जीवन प्रदान करता है तो हम कौन होते है किसी के जीवन को खतम करने वाले..?  कई मंदिरो मे आज भी कई बकरियों एवं बैसों की बली दी जाती है, कुछ रूढीवादी ख्यालात  वाले लोगों  की सोच के कारण निर्दोष जानवरों की हत्या की जाती है, पर क्यो..?? ये सोचने वाली बात है...!
कुछ लोगों ने इस पर अमल जरूर किया है और इसके विरुद्ध  आवाज भी उठाई और कई जगह ये सफल भी हुए, पर दु:ख  की बात यह है कि  कुछ लोगो की सोच अभी तब नये जमाने को दस्तक नहीं दे पायी.  इसी कारण कई जगह ये परम्परा के नाम पर बली प्रथा को प्रोत्साहित करते है.!!
वैसे तो बली प्रथा आज पूरे भारत में एक अभिशाप के रूप में उभरा हुआ है परन्तु कुछ राज्यों मे ज्यादा ही बली की परम्परा का प्रचलन है उनमे से एक राज्य है उत्तराखंड !! देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखण्ड में आज भी कई मंदिरो मे देवताओं के नाम पर  बली दी जाती है.
उत्तराखण्ड कें गढ़वाल एवं कुमांऊ क्षेत्रों में समान्तर रूप से बलि की प्रथा बहुत समय पहले से प्रचलित है. प्रम्पराओं एवं देवताओं के नाम पर की जाने वाली हत्या हर जगह अलग अलग रूप में होती  है. कहीं सामूहिक रूप के किया जाता है और कहीं व्यक्तिगत रूप से..!
गाँवो में दी जाने वाली बलि व्यक्तिगत रूप से परिवार के कुल देवता के लिए या भूत प्रेत आत्माओं के लिए  जाती है,.! . और सामूहिक रूप से दी जाने वाली बलि गाँव के देवता या स्थान देवता को दी जाती है. कहा जाता है अगर बलि नहीं हुई तो देवता संतुष्ट नहीं होगें. और नारज हो कर अपना प्रकोप मनुष्यों के जीवन मे डालेंगे. इससे बचने के लिए बलि दी जाती है.!
मेरी आज तक एक बात समझ में नहीं आयी जब लोग बली करते है तो सारा माँस खुद खा लेते है तो देवता क्या खाते है?? ये सोचने वाली बात है. एक बात और  सबसे पहले देवता गण माँसाहारी नहीं थे जितने भी माँसाहारी थे वो सब राक्षस गण थे तो क्या हम राक्षसों की पूजा करते है..? क्योंकि राक्षस गणो को ही मांस मदिरा चढाया जाता है.!  बात साफ है देवताओं के नाम पर खुद का शौक पूरा करना. नाम देवताओं का और राक्षस खुद बनना.. यानि कि जितने भी बलि होती है वो देवताओं के लिये नहीं बल्कि देवताओं के नाम पर खुद के लिए होती है.
उत्तराखंड में कई जगहों कर 8-9 दिन का प्रारम्परिक उत्सव मनाया जाता है इस उत्सव को भिन्न जगहों मे  अलग अलग  नामों से जाना जाता है.  गढ़वाल में कुछ हिस्सों मे इस उत्सव को अठवाडे़ (अठवार) के नाम से जाना जाता है क्योंकि ये 8 दिन का उत्सव होता है ये गढ़वाल एवं कुमांऊ दोनो क्षेत्रो मे होता है. इस उत्सव मे कई बकरे और अन्तिम दिन  नर भैसों की बली दी जाती है..!
प्रशासन द्वारा भी इसको रोकने की कई कोशिस की गई है पर प्रशासन भी अभी तक  नाकाम रहा है.
बलि प्रथा की सुर्खियों की वजह उत्तराखंड के बुनखल में हुई पशु बलि और इसे लेकर विरोध के स्वर कुछ इस कदर मुखर किए कि एक बार फिर यह कुरीति चर्चा का सबब बन बैठी । उत्तराखंड में कई ऐसे मेले और त्योहार हैं जिनमें बलि का चलन है । गढ़वाल एवं  कुमांऊ में आयोजित होने वाले अधिकांश मेले ऐसे ऐतिहासिक आख्यानों से भरे पड़े हैं । परम्परा  के मुताबिक इन आयोजनों में पशुओं की बलि देने का रिवाज है । ऐसा ही एक मेला बूंखाल मेला है । इस मेले में सैकड़ों बकरों समेत नर भैसों की जान शक्ति उपासना के नाम पर ली जाती है ।  जैसे पहले ही बता चुका हूँ कि गढ़वाल में मेलों को अठवाड़े के नाम से भी जाना जाता है ।  गढ़वाल में बलि प्रथा की बात की जाए तो अठवाड़े से ही इसका चलन शुरू होता है । हालांकि तमाम मेलों में प्रशासन द्वारा बलि प्रथा बंद करने की कोशिश की गयी है   लेकिन बूंखाल में यह क्रूर प्रथा आज भी कायम है । बीते साल सामाजिक संगठनों और प्रशासन की जद्दोजहद के बाद नब्बे नर भैसों और हजारों बकरों की बलि चढ़ाई गई थी । राज्य सरकार ने पशु बलि अवैध घोषित कर रखी है लेकिन इस मेले में इसे रोकने की अभी तक कोई सफल कोशिश दिखाई नहीं देती है । प्रशासन यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि जनजागरण के प्रयास किए जा रहे हैं । धार्मिक प्रथा पर बलपूर्वक रोक नहीं लगाई जा सकती । कुछ   संस्थाओं ने इस क्रूर प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई है । इन्हीं के चलते मेला क्षेत्र में धारा 144 लागू करनी पड़ी जबकि ठीक इसके उलट एक प्रमुख दल ने पौड़ी के जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर पशु क्रूरता कानून 1960 की धारा-28का हवाला देते हुए मेले में धारा-144 लगाए जाने को गैर कानूनी बताया । गौरतलब है कि धारा-28 के अंतर्गत धार्मिक अनुष्ठानों के लिए प्रतिबंधित पशुओं को छोड़ अन्य पशुओं की बलि कानूनन अपराध नहीं है ।
पर बलि क्यों..? क्या यह उचित है? क्या किसी की हत्या करना उचित है..? अगर कोइ किसी इंसान की हत्या करता है तो उसे जीवन कारवास या फाँसी की सजा का प्रावधान है किन्तु जानवरों की हत्या पर क्यों नही ? क्या वो प्राणी नही है क्या उनको जीने का हक नहीं है भगवान ने तो सबको एक समान जीवन एवं जीने का हक प्रदान किया है फिर ये भेद भाव क्यो?
उनकी हत्या इसलिये की जाती है क्योंकि वो मासूम गूंगे एवं लाचार है?? या वो प्रतिक्रिया देने मे असमर्थ है इसलिए?? पशु की हत्या करने वालो को सजा क्यों नही होती? जो एसे भेद भाव करे उसे इंसान कहते है..? क्या सच मे वो इंसान कहने लायक है? ये कैसा समाज  है जहाँ निर्दोष एवं लाचारों की बली दी जाती है और दोषियों की वह्हा वाही..! आखिर ये भेद भाव क्यों..? एसे विकृ्ति मानसिकता को क्या हम इंसानियत कह सकते है? ये बहुत बडी़ एवं गम्भीर सोचने वाली बात है..! आखिर कब तक निर्दोषों की बली होती रहेगी और हम एसे ही अपंगो की तरह हाथ पर हाथ धरे रहेगे..? सोचिये..!!
आइए सब मिल कर इस प्रथा को समाज से दूर करने का संकल्प लें.

धन्यवाद ..!!

© देव नेगी



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