बुधवार, 25 जुलाई 2012

लोकगाथा में रूपकुंड का इतिहास एवं परिचय द्वितीय भाग


Posted by देव नेगी

रूपकुंड और त्रिशूल शिखर :
त्रिशूल शिखर
रूपकुंड रहस्य की ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक आधार पर जांच पड़ताल के बाद तथा घाटी के आखिरी गांव बाण एवं अन्य गाँव  के वृद्ध लोगों और लोकोक्तियों एवं लोक गीतों  के अनुसार यह निष्कर्ष निकाला जा चुका है कि चौदहवीं शताब्दी (12वीं शताब्दी) में तत्कालीन कन्नौज की महारानी बल्लभा द्वारा अपना अपमान किये जाने से देवी नंदापार्वती कुपित हो उठी। इसके बाद ही सारे राज्य पर अकाल की छाया मंडराने लगी तथा अनेक प्राकृतिक प्रकोप होने लगे। कुएं सूख गये। धरती फट प़डी। पशुपक्षी और प्रजनन त्राहि-त्राहि कर उठे। अचानक आई इस विपत्ति से छुटकारा पाने के लिए राजा यशधवल (यशोधवल) ने यज्ञादि जितने भी अनुष्ठान किये व्यर्थ ही गये। तब, नंदा पार्वती ने उसे स्वप्न में दर्शन देकर कहा, ‘यशधवल’ धुर उत्तर में त्रिशूल एवं नंदाघुंघटी नाम की दो पर्वत चोटियाँ हैं। इनमें से त्रिशूल भगवान शिव का प्रतिरूप है, तो नंदा घुंघटी साक्षात में स्वयं इन दोनों से अलग-अलग प्रवाहित होने वाली दो जल धाराएं घाटी में जिस स्थल पर गिरकर नंदाकिनी नदी का रूप धारण करती हैं, ठीक वहीं स्थित होमकुंड में पूजा अर्चना कर तू, जब तक मेरी अभ्यर्थना नहीं करेगा, तब तक इस विपत्ति से छुटकारा नहीं पा सकेगा। और यहाँ ये बताना चाहुँगा कि त्रिशूल पर्वत एवं नन्दा घुंघटी आज भी साक्षात  बिराजमान है..!
राजा यशधवल ह़डब़डाकर तुरंत उठ बैठा। आनन-फानन में देवी का जाप कर जाने का डंका पिटवाया गया। फिर तो क्या राजा रानी, मंत्री और क्या प्रजानन, सभी देवी नंदापार्वती की जाप करने निकल प़डे। यात्रियों का यह विशाल दल जब बेंदिनी बुग्याल से आगे पहुंचा, तो एक उपयुक्त स्थान देखकर प़डाव डालने के बाद नृत्य संगीत व मदिरा पान के आयोजन की तैयारी की जाने लगी। इस पर राज पुरोहित ने यशधवल को समझाया, ‘हे राजन भजन कीर्तन की जगह देवभूमि पर रासरंग का आयोजन करना उचित प्रतीत नहीं होता। कृपया, अपना यह विचार तुरंत त्याग दें।’ अट्टहास कर राजा यशधवल ने राज पुरोहित की खिल्ली उ़डाते हुए जवाब दिया, ‘राज पुरोहित जी, आप कहीं एकांत देखकर खूब संकीर्तन करें। हमारे देवता तो नृत्य संगीत के आयोजन से ही प्रसन्न होंगे।’ परंतु उधर, राजा का संकेत पाकर राजनर्तकियों ने जैसे ही नाचना प्रारंभ किया, वैसे ही पत्थर की मूर्तियों में परिवर्तित हो गई। इस घटना से यशधवल बेहद घबराया। किसी प्रकार रात वहीं गुजारने के बाद जब वह अपने दलबल सहित रूपकुंड पहुंचा, तो अनायास ही रानी बल्लभा को प्रसव प़ीडा ने आ घेरा और उसने शीघ्र ही वहीं एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। कन्या रत्न को देवी का वरदान समझकर राजा यशधवल इतना हर्षाया कि पूर्व रात्रि को नर्तकियों के साथ घटित पूरी दुर्घटना को भूलकर वह पुनः रासरंग में डूब गया। बस, फिर क्या था। पलक झपकते ही तारों भरा सारा आकाश काले-काले बादलों से उम़डने घुम़डने लगा। हवा झंझावात बन गई। बिजली की घनघोर गरज के साथ इतनी मूसलाधार वर्षा हुई कि प़डाव के न केवल सारे डेरे तम्बू उख़ड गये, बल्कि बेगवती जल धारा के साथ-साथ बहकर राजा रानी सहित सभी यात्रीगण भी रूपकुंड में जा समाए और इस प्रकार अपने अतीत को दुहराता कन्नौज एक बार फिर उज़ड गया। अत: ये नरकंकाल व अस्थियां आदि वस्तुऎं उसी समय के बताये गये हैं। कुछ लोग तिब्बत से आये यात्री दल के अवशेष बताते हैं।  

रहस्यमय नरकंकालों से अटी पडी रूपकुंड झील अपनी प्राकृतिक संरचना, भौगोलिक परिवेश और प्रचलित किंवदंतियों के कारण वर्तमान में विश्व भर के लिए प्रबल जिज्ञासा, असामान्य कौतुहल तथा विषद वैज्ञानिक परिचर्चा की महत्त्वपूर्ण विषय वस्तु बन गई है।
लोकगाथाओं व लोकगीतों से शुरू हुई रहस्य कथा रेडियो कार्बन विधि की जांच के बाद भी खत्म नहीं हुई। स्थिति जो कुछ भी हो लेकिन इतिहासकारों एवं वैज्ञानिकों के लिये रूपकुंड रहस्य एक बहुचर्चित विषय बन गया है। इस बीच इन पांच-छह दशकों में इस क्षेत्र में जितनी भी खोज तथा अन्वेशण कार्य किये गये हैं उसमें विशेषज्ञ एकमत व निष्कर्ष पर नहीं पंहुच पाये हैं। लेकिन अनेक अन्वेशक व खोजकर्ता प्राय: इस निष्कर्ष पर तो अवश्य पंहुचे हैं कि ये नरकंकाल व अस्थियां आदि वस्तुऐं छह-सात सौ वर्ष पुराने रहे होंगे।
यह रहस्यमय झील ग्रीष्मकाल वर्षा ऋतु के तीन-चार महीने (मई से अक्टूबर  तक) बर्फ़ पिघलने से दिखाई देती है और शेष अवधि में हिमाच्छादित रहती है। आज भी रूपकुंड के आसपास यत्र-तत्र व किनारों पर छुटपुट मानव कंकाल व अस्थियां के टुकड़े पड़े दिखाई देते हैं लेकिन पर्यटकों, अन्वेशकों आदि भ्रमणकर्ताओं के आगमन के बाद अब इस क्षेत्र में ये वस्तुऐं धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं। यह गतिविधि पुरातात्विक स्थल रूपकुंड के इतिहास को नष्ट करती रही है।
रूपकुंड झील यात्रा :

रूपकुंड तक का मार्ग अत्यंत मोहक और प्राकृतिक छटाओं से भरा है। घने जंगल, मखमली घास के चरागाह, फूलों की बहार, झरनों नदी-नालों का शोर, बड़ी-बड़ी गुफाएं, गांव, खेत सर्वत्र एक सम्मोहन पसरा हुआ है। गहरी खामोशी में डूबी चट्टानों के बीहड़ जमघट में भी एक आनन्द छुपा है।
शीतकाल में रूपकुंड यात्रा का अभियान नितांत असंभव है। वर्षा ऋतु में भी ऐसा प्रयास मृत्यु को आमंत्रण देने जैसी ही बात होगी, जबकि मई और जून की भीषण गर्मी वाले दिन भी पर्यटन के लिए तभी अनुकूल सिद्ध होंगे कि जब ‘ट्रेकिंग’ की आधुनिक साजसज्जा से युक्त होकर सामूहिक रूप से आरोहण किया जाये।
रूपकुंड की यात्रा के लिए जून उत्तरार्द्ध से सितम्बर उत्तरार्द्ध का समय सर्वोत्तम होता है क्योंकि इसके बाद इस पूरे क्षेत्र में हिमपात का सिलसिला प्रारम्भ हो जाता है जिससे पर्यटकों को यात्रा के लिए अनुकूल परिस्थितियां दुर्लभ हो जाती हैं।

रूपकुंड पंहुचने के लिए मार्ग :

रूपकुंड पंहुचने के लिये भिन्न मार्ग है उनमें से प्रमुख मार्गों का परिचय निम्न्वत है.
इस विश्वप्रसिद्ध रहस्यमय रूपकुंड स्थान में पंहुचने के लिये मुख्यत:
कर्णप्रयाग से थराली, देवाल, वाण, गैरोलीपातल, वेदिनी बुग्याल, कैलोविनायक, रूपकुंड (लगभग 155 किमी)।
नन्दप्रयाग से घाट, सुतोल, कनोल, वाण, वेदिनी बुग्याल, रूपकुंड। ग्वालदम से देवाल, वाण, वेदिनी बुग्याल, रूपकुंड।
हरिद्वार से लगभग 350 किमी की दूरी पर स्थित रूपकुंड तक पहुंचने के लिए कर्णप्रयाग होते हुए बळ्डग़ाड तक (कुल 222 किमी) बस अथवा कार द्वारा सफर किया जा सकता है। कर्ण प्रयाग से पिण्डारी नदी के किनारे-किनारे थराली होते हुए देवल वहां से 13 कि.मी. बकरीगढ़ तक कच्चा मार्ग है। रूपकुंड पहुंचने के लिए अंतिम बस स्टेशन बकरीगढ़ (बगरीगाड़) है। यहां से रूपकुंड तक 41 किमी की पैदल यात्रा करनी पड़ती है। बगरीगाड़ में पोर्टर गाइड मिल जाते हैं, यहीं से इन्हें साथ ले चलना बेहतर रहता है। खाने-पीने, पहनने का पर्याप्त सामान लेकर ही ट्रैकिंग शुरू करनी चाहिए। बग़डग़ाड से प्रारम्भ होती है सीधी ख़डी च़ढाई और फिर दुरुह पगडंडियां। बकरीगढ़ से 3 कि.मी. मुन्दौली गांव होते हुए वा 7 किमी का फासला तय करने के बाद आती है, लौहजंग सुरम्य एवं पौराणिक स्थली, जहां पहुंचते-पहुंचते वैसाख व जेठ के गर्म थप़ेडों से त्रस्त यात्री को शीतल हवा के स्पर्श से अथाह आनंद की अनुभूति होने लगती है। लौहजंग से रूपकुंड के लिए दो रास्ते जाते हैं। एक वाण से होकर, दूसरा बांक से गुजरते हुए। एक तीसरा रास्ता और भी है, जो घने जंगल की ओर फटता है, जिस पर च़ढते उतरते नौ किमी का रास्ता तय करते हुए ‘भैंकल ताल व ब्रह्मताल’ नामक पर्यटन स्थल प़डते हैं। फिर, गुंजान जंगलों से बाहर निकलते ही रंगबिरंगे चित्ताकर्षक फूलों व मखमली घास से लदेफंसे तितली, बुग्याल, चारागाह (ऊंचाई 10000 फुट) की मनोरम छटा बरबस ही पर्यटकों का मन मोहने लगती है। लेकिन, रूपकुंड यात्रा की दृष्टि से यह रास्ता न केवल विषम है, वरन्‌ थ़ोडा लम्बा भी प़डता है।
प्रकृति की अनूठी कृति रूपकुंड का अवलोकन करने जाने के लिए श्रीनगर, कर्णप्रयाग तथा देवाल होते हुए भी जाया जा सकता है, लेकिन यदि ट्रैकिंग के रूप में ग्वालदम से पदयात्रा की जाए तो पर्यटक उस क्षेत्र के ग्रामीण जनजीवन, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक विरासत तथा अनछुए स्थलों से जुड़े विशिष्ट अनुभवों से ओत–प्रोत होकर लगभग 10 दिन की अवधि में रूपकुंड पहुंचता है। पर्यटक तीन दिन की पदयात्रा के प्रथम चरण में मुंदोली तथा बाण होते हुए लगभग 70 किमी की दूरी तय करने के पश्चात वेदनी बुग्याल पहुंचते हैं।
वाण होकर रूपकुंड जाने का कुछ अलग ही आनंद है। लौहजंग (ल्वाजिंग्) से 15 किमी के फासले पर स्थित यह चित्रमयी गांव धुर उत्तर में ग़ढवाल की सीमांत बस्ती है, जिसका मुख्यालय चमोली है। यहां के निवासी चरवाहे हैं, जो ग्रीष्म ऋतु में अपने पशुओं को लेकर बेदिनी बुग्याल चले जाते हैं। दुमंजिले तिमंजिले मकानों के निर्माण की जो शैली यहां अपनाई गई हैं, ग़ढवाल में वह अन्यत्र कहीं नहीं मिलती। ख़डे ढलानों पर बहती बेगवती नदी के किनारे चकचक करती पन चक्कियों का शोर, शहरी कोलाहल से ऊबे पर्यटक को अद्‌भुत आनन्द प्रदान करता है। यहां ग़ढवाल मंडल विकास निगम का रेस्ट हाउस भी है और डाक बंगला भी। बाज़ार है तो छोटा, किंतु आवश्यकता की प्रायः सभी चीजें मिल जाती हैं।
लौहजंग (ल्वाजिंग्) से प्रारम्भ हुए बांस और बुरांस के जंगल की सघनता वाण से आगे गहरी होने लगती है। प्रत्येक दस-पन्द्रह क़दम पर म़ोड लेती हुई ऊब़ड-खाब़ड संकरी व फिसलन भरी पगडंडी इस क़दर बल खाये हुए कि जहां नजर चूकी, दुर्घटना घटी। बीच-बीच में गधेरो (बरसाती नदी) को पार करने की मुसीबत ऊपर से जंगल का नाम हैगैरोली पातल, जिसे पार करते ही बेंदिनी बुग्याल का दिलकश नजारा सहसा ही मन प्राणों को गुदगुदा उठता है। यहां मखमली हरी घास के मैदान हैं जिन्हें कश्मीर में सोनमर्ग और गुलमर्ग जैसे नामों से जाना जाता है। समुद्रतल से 2400 मीटर (चारागाह ऊंचाई 12000 फुट) की ऊंचाई पर पसरा हुआ वेदनी बाग़ एशिया के प्रमुख विशाल बागों में से एक है। मीलों तक फैली रेशमी घास तथा नाना प्रकार के ख़ूबसूरत फूलों से फूटती सुगंध का स्पर्श कर इठलाती हवा जैसे सांस-सांस में रम जाती है। यहां पहुंचने पर पर्यटक की थकान पल भर में उड़न छू हो जाती है और वह ताजगी से सराबोर होकर अनोखी स्फूर्ति का अनुभव करता है। उसे यहां असीम सुखद आनंद की अनुभूति होती है। यह सम्पूर्ण क्षेत्र विभिन्न रंग–बिरंगे पुष्पों की अनेक प्रजातियों तथा नाना प्रकार की औषधियुक्त दुर्लभ जड़ी–बूटियों से भरा पड़ा है जहां पर्यटक को स्वतः ही स्वास्थ्य लाभ प्राप्त हो जाता है। कहा जाता है कि वेदों की रचना यहीं पर की गई थी। यत्र-तत्र बहते ध्वजधार वाले झरने जहां इस चारागाह के अपलक सौन्दर्य में श्री वृद्धि करते हैं, वहीं बीचोंबीच स्थित ‘वैतरणी’ नाम का ताल भारतीय संस्कृति के वांग्मय की दिव्य धरोहर बन गया है। यहां 4 – 4 फुट के आकार वाले लघु मंदिरों की श्रृंखला पर्यटक को श्रद्धा एवं भक्ति से भावविभोर कर देती है। पौराणिक मान्यता यह है कि यहां मौजूद एक छोटे कुंड में पूर्वजों के पिंड दान कर देने से उन्हें तत्काल मोक्ष मिल जाता है।

बैदिनी बुग्याल  :

यों ही वादियों के मनोरम दृ्श्यों के आगोश मे चलते ललते मन को मोह लेने वाला दृ्श्य बैदिनी बुग्याल के रूप मे आता है. यहाँ पर आकर प्रयटक सारी थकान भूल जाता है और प्रकृ्ति के इन सुन्दर वादियों में खो जाता है. और  अगले 18 किलोमीटर की पदयात्रा के बाद पर्यटक रूपकुंड के पास पहुंच जाता है। बैदिनी के बाद च़ढाई बिल्कुल सपाट और बेहद तीखी हो जाती है। कहीं कहीं तो पगडंडी के दोनों ओर हजारों फुट गहरी खाइयां है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से सांस फूलने लगती है। चित्रांकित घाटियों एवं पर्वतशिखरों पर लहराती महीन कोहरे की पारदर्शी पर्व तथा हवा में घुली हुई ब्रह्म कमलों तथा विभिन्न प्रकार की ज़डी बूटियों की मादक गंध शिराओं में नशासा बनकर बहने लगती है। ऐसे मनहरन वातावरण में एकएक क़दम ब़डे मनोयोग से फूंक-फूंक कर चलना प़डता है। रात्रि प़डाव के लिए पातुर नचैणियां सर्वाधिक उपयुक्त स्थल है। यहां ल़ुढकी प़डी तीन चट्‌टानों में परिलक्षित पूर्ण स्त्री आकृतियां रूपकुंड से ज़ुडकर उसके रहस्य को और भी अधिक गहरा देती है। धुंध की चादर यहां मोटी हो जाती है और थ़ोडी-थ़ोडी देर बाद बूंदाबांदी होने लगती है। यात्रा का यह अन्तिम प़डाव होता है।
इस दिव्य कुंड की अथाह गहराई, कटोरेनुमा आकार तथा चारों ओर बिखरे नर कंकाल व वातावरण में फैले गहन निस्तब्धता से मन में कौतूहल व जिज्ञासा का ज्वार उत्पन्न हो जाता है। रूपकुंड के रहस्य का प्रमुख कारण ये नर कंकाल ही हैं जो न केवल इसके इर्द–गिर्द दिखते हैं बल्कि तालाब में इनकी परछाइयां भी दिखाई पड़ती हैं। इन अस्थि अवशेषों के विषय में क्षेत्रवासियों में अनेक प्रकार की किवदन्तियां प्रचलित हैं जिन्हें सुनकर पर्यटक रोमांचित हो उठता है। वर्षों से पुरातत्ववेत्ता व इतिहासकार इन नर कंकालों के रहस्य का पता लगाने में जुटे हैं लेकिन अब तक कोई ठोस और सर्वमान्य हल नहीं निकाल पाए हैं।
सम्पूर्ण उत्तराखण्ड  को प्रकृति ने अपने विपुल भण्डार से अद्भुत सौंदर्य देकर काफ़ी समृद्ध बनाया है जिसका लुत्फ उठाने के लिए देश–विदेश के हजारों पर्यटक हर वर्ष यहां आते हैं। लेकिन मौजूदा पर्यटन स्थलों में बहुत से स्थान अछूते पड़े हैं जिनके विषय में पर्यटन विभाग सड़कों के किनारे सम्बंधित स्थलों के विवरण दर्शाते साइनबोर्ड लगाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है, रूपकुंड भी इन्हीं में से एक है।
कालू विनायक – (भगवान गणेश की प्रतिमा)
कालू विनायक 

तब, प्रारंभ होती है एकदम घुमावदार बेहद ख़डी विकट च़ढाई, जिस पर रेंगते हुए ब़ढना भी बिना पर्याप्त प्रशिक्षण के असंभव है। राह में प़डते हैं, कालू विनायक। किसी आदि कलाकार द्वारा चट्टान के निकट काले भाग को तराश कर निर्मित की गई यह गणेश प्रतिमा संभवतः संसार भर में अद्धितीय है।  कहा जाता है कि भगवान गणेश की यह मूर्ति आदिकाल  से यहाँ पर स्थापित है. इसका इतिहास भी किसी को पूर्णत्या पता नहीं है. स्थानीय लोगों के मान्यता अनुसार रूप कुंड जाने वाले हर यात्री को गणेश भगवान की इस प्रतिमा की परिक्रमा, पूजा करना और इसे छूना अनिवार्य था ताकि जो भी आगे जाये उसका मन चित शुद्ध हो जाए! यदि कोई इसकी अवहेलना करता तो आगे जाकर आने वाली ज्योंरा को गली पास नहीं कर पाता!  इस प्रतिमा के बारे मे यह मान्यता भी है कि जो भी इसे श्रद्धा पूर्वक उठाने की कोशिस करता है तो उठा लेता है अन्यथा कोई इसे हिला तक नहीं पाता.  रूपकुंड यहाँ से कुल छह किमी दूरी पर है.
बकोवासा एवं  ज्योंरा गली :
फिर आगे रूपकुण्ड के लिए सीदे रास्ते के जरिए बकोवासा पहुँच जाते है  यह रस्ता सीदे ही तय करना पड़ता है फिर बकोवासा से सीदी चढाई का कठिन  टूटा फूटा मार्ग तय करने के बाद ज्योंरा गली पर आते है ये गली बडी़ संकरी एवं चट्टानूमा है इस गली को पार करने के पश्चात रूप कुण्ड के कुछ और भी करीब पहुँचने का  अहसास मह्सूस होता है.  ज्योंरा गली के बारे मे कहा जाता है कि इसे हर कोई पार नहीं कर पाता है इसी कारण कई लोगों को यही से वापिस लौटना पड़ता है।
रूपकुंड

रूपकुंड  :
ज्योंरा गली को पार करते ही मन में एक अजीब सी उमंग दौड़ती है ऎसा महसूस होता है मानो बस यही दुनियाँ की सबसे खूबसूरत जगह है  इंसान खुद को ही भूल जाता है.  इसको बयां नहीं किया जा सकता सुन्दर वादियाँ प्रकृ्ति की सुन्दरता एवं मन को मोह लेने वाले दृ्ष्य. इंसान को भावुक बना देते हैं.  रास्ते मे कई जगह मानव कंकाल एवं अन्य चीजें नजर आती है जो कई वर्षों से एसे पडे़ हुए हैं.  फिर कुछ दूरी पर रूपकुंड के दर्शन करके सारी थकान मानो गायब ही हो जाती है और इंसान अपने को धन्य मानता है.! रूपकुंड के आस पास भी मानव कंकाल के अवशेष दिखने को मिलते है.! फिर कई धार्मिक लोग यहाँ अपनी मनोकामनाएं लेकर पूजा करते है. और पर्यटक प्रकृ्ति के इस अदभुत नजारे का लुफ्त उठाते हैं..!
धन्यवाद..!!
नोट :  (स्रोत: भिन्न भिन्न जगहों से ली गयी जानकारी के आधार पर  )


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सोमवार, 23 जुलाई 2012

लोकगाथा में रूपकुंड का इतिहास एवं परिचय प्रथम भाग



रूपकुंड 
रूपकुंड  :


उत्तराखण्ड भिन्न भिन्न संकृ्तियों एवं प्रकृ्तिक धरोहरो से सुसज्जित प्रदेश है प्राकृ्तिक सुन्दरता तो मानो कि भगवान ने खुद अपने हाथों से प्रदान की हो..! और इसके कई सबूत के तौर पर पौराणिक स्थलो के रूप मे हमारे सामने है और उन सब में एक जगह रूप कुंड है..!
गढ़वाल हिमालय के अन्तर्गत अनेक सुरम्य ऐतिहासिक स्थल हैं जिनकी जितनी खोज की जाय उतने ही रहस्य सामने आ जाते हैं। इन आकर्षक एवं मनमोहक स्थलों को देखने के लिये प्राचीन काल से वैज्ञानिक, इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ताओं भूगर्भ विशेषज्ञों एवं जिज्ञासु पर्यटकों के क़दम इन स्थानों में पड़ते रहे हैं। उत्तराखण्ड मे इतने कितने ही रहस्यमयी स्थान है हो लोगों की बहुँच से काफी दूर है.

यहां उच्च हिमालय क्षेत्र के अन्तर्गत अनेक ताल एवं झील हैं जिनमें उत्तरांचल के चमोली ज़िले के सीमान्त देवाल विकास खांड में समुद्र तल से 16200 फुट की ऊंचाई पर स्थित प्रसिद्ध नंदादेवी राजजात यात्रा मार्ग पर नंदाकोट, नंदाघाट और त्रिशूल जैसे विशाल हिम पर्वत शिखरों की छांव में चट्टानों तथा पत्थरों के विस्तार के बीच फैला हुआ प्रकृति का अनमोल उपहार एवं अद्वितीय सौन्दर्य स्थान रूपकुंड एक ऐसा मनोरम स्थल है जो अपनी स्वास्थ्यवर्धक जलवायु, दिव्य, अनूठे रहस्यमय स्वरूप और नयनाभिराम दृश्यों के लिए जाना जाता है। यह रूपकुंड झील त्रिशूली शिखर (24000 फीट) की गोद में ज्यूंरागली पहाड़ी के नीचे 150-200 फीट ब्यास (60 से 70 मीटर लम्बी), 500 फीट की परिधि तथा 40 से 50 मीटर गहरी हरे-नीले रंग की अंडाकार (आंख जैसी) आकृति में फैली स्वच्छ एवं शांत मनोहारी झील है। इससे रूपगंगा जलधारा निकलती है। अपनी मनोहारी छटा के लिये यह झील जिस कारण अत्यधिक चर्चित है वह है झील के चारों ओर पाये जाने वाले रहस्यमय प्राचीन नरकंकाल, अस्थियां, विभिन्न उपकरण, कपड़े, गहने, बर्तन, चप्पल एवं घोड़ों के अस्थि-पंजर आदि वस्तुऐं।

यह झील बागेश्वर से सटे चमोली जनपद में बेदनी बुग्याल के निकट स्थित है। उत्तरांचल के उत्तर में हिमालय की अनेक चोटियों के बीच त्रिशूल की तीन चोटियां हैं। ये चोटियां गढ़वाल इलाके के चमोली ज़िले व कुमाऊं इलाके के बागेश्वर ज़िले की सीमा पर स्थित हैं। भगवान शिव का त्रिशूल माने जाने वाले हिमश्रंग त्रिशूल चोटी के बगल में ही रूपकुंड है। समुद्रतल से 4778 मीटर की ऊंचाई पर और नन्दाघुंटी शिखर की तलहटी पर स्थित रूपकुंड झील सदैव बर्फ़ की परतों से ढकी रहती है। अतः इसे हिमानी झील कहते हैं। इसे रहस्यमयी झील का नाम दिया है। म़ोढे की पीठ जैसी आकृति में इसके किनारे ख़डी चट्टानों पर सदैव जमी रहने वाली श्वेत बर्फ़ का अक्स झील के धवल जल में और जल की चंचल लहरों के बनते बिग़डते प्रतिबिम्ब बर्फ़ के दर्पण में झिलमिला कर इस स्थल की नैसर्गिक छटा को द्विगणित कर देते हैं। इसकी स्थिति दुर्गम क्षेत्र में है। झील से सटा ज्यूरांगली दर्रा (5355 मीटर) है। वैसे, शिवालिक पर्वतमाला में मणि की भांति गुंथा हुआ यह अति प्राचीन पौराणिक तीर्थ उन पर्वतारोहियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है, जो जान जोखिम में डालकर भी विविध रूपा सृष्टि के ग़ूढ तत्वों को खोज लेने हेतु सतत प्रयत्नशील रहते हैं।

रूपकुंड की उत्पत्ति पर पौराणिक कथाए :
माँ नन्दा देवी की डोली

हर बारहवें वर्ष नौटी गांव के हजारों श्रद्धालु तीर्थ यात्री राजजात  यात्रा लेकर निकलते हैं। नंदादेवी की प्रतिमा को चांदी की पालकी में बिठाकर रूपकुंड झील से आचमन करके वे देवी के पावन मंदिर में दर्शन करते हैं। इस यात्रा से संबंधित कथा के अनुसार अपने स्वामी गृह कैलाश जाते समय अनुपम सुंदरी हिमालय (हिमवन्त) पुत्री नंदादेवी जब शिव के साथ रोती-बिलखती जा रही थी मार्ग में एक स्थान पर उन्हें प्यास लगी। नंदा-पार्वती के सूखे होंठ देख शिवजी ने चारों ओर देखा परन्तु कहीं पानी नहीं दिखाई दिया, उन्होंने अपना त्रिशूल धरती पर मारा, धरती से पानी फूट पड़ा। नंदा ने प्यास बुझाई, लेकिन पानी में उन्हें एक रूपवती स्त्री दिखाई दी जो शिव के साथ बैठी थी। नंदा को चौंकते देख शिवजी समझ गये, उन्होंने नंदा से कहा यह रूप तुम्हारा ही है। प्रतिबिम्ब में शिव-पार्वती एकाकार दिखाई दिये। तब से ही वह कुंड रूपकुंड और शिव अर्द्धनारीश्वर कहलाये। यहां का पर्वत त्रिशूल और नंद-घुंघटी कहलाया, उससे निकलने वाली जलधारा नन्दाकिनी कहलायी।
पुराण कथाओं के अनुसार यहां जगदम्बा, कालका, शीतला, सतोषी  आदि नव दुर्गाओं ने महिषासुर का वध किया था।

लाटू देवता - क्षेत्रीय देवता:

लाटू देवता, वाण गाँव 


लाटू देवता का मंदिर वाण का प्रमुख आकर्षण है। लाटू कैदखाने में रखे गये देवता हैं और 12 वर्ष में एक बार चंद घंटों के लिए केवल तभी मुक्त किये जाते हैं। जब नंदा राजजात के दौरान देवी नंदापार्वती की डोली त्रिशूल पर्वत पर ले जाती है। लाटू को मिली कैद की इस सज़ा के मूल में किंवदंती इस प्रकार है कि शिवजी के साथ विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद देवी नंदा की डोली कैलाश ले जाई रही थी, तो अन्य भाईबंधुओं के साथ चचेरे भाई लाटू भी उन्हें विदाई देने के लिए साथ-साथ चले। किंतु वाण पहुंचते पहुंचते उनका कंठ प्यास के कारण बुरी तरह सूखने लगा। इधर-उधर द़ौड लगाने के बाद उन्हें दूर पर एक मकान दिखलाई दिया। मकान का मालिक सोया प़डा था। लाटू ने उसे झिंझ़ोड कर जगाया और पानी मांगी। नींदे से मकान मालिक ने एक कोने में रखे मटके की ओर इशारा कर दिया, जिसमें भारी मदिरा देखकर उनका मन ललचा गया और पूरा मटका मुंह से लगाकर गटागट पी गये। मद्य ने भी अपना रंग जल्दी ही दिखलाया। बस, लगे वह उत्पात मचाने। उनकी इस हरकत से क्षुब्ध होकर देवी नंदा ने उन्हें वहीं कैद कर डालने का आदेश दे डाला। तब से बेचारे यहीं बंद प़डे हैं। वैसे, लाटू इस क्षेत्र के सर्वमान्य देवता है। उनका नाम लेकर मनौतियां तक मांगी जाती है।


रूपकुंड झील में नरकंकाल और अस्थियां :


झील के पास नर कंकाल 
रूपकुंड झील वर्षों तक दुर्गम होने के कारण अज्ञात ही रहा। रूपकुंड के आसपास पड़े अस्थियों के ढेर एवं नरकंकालों की खोज सर्वप्रथम वर्ष 1942 - 43 में भारतीय वन निगम के एक अधिकारी द्वारा की गई। वन विभाग के अधिकारी मढ़वाल यहां दुर्लभ पुष्पों की खोज करने गए थे। एक रेंजर अनजाने में झील के भीतर किसी चीज से टकराया। देखा तो कंकाल पाया। खोज की तो रहस्य और गहरा गया। झील के आसपास और तलहटी में नरकंकालों का ढेर मिला। अधिकारी के साथियों को ऐसा लगा, जैसे वे किसी दूसरे ही लोक में आ गए हों। उनके साथ चल रहे मजदूर तो इस दृश्य को देखते ही भाग खड़े हुए। इसके बाद शुरू हुआ वैज्ञानिक अध्ययन का दौर। 1950 में कुछ अमेरिकी वैज्ञानिक नरकंकाल अपने साथ ले गए।

अनेक जिज्ञासु-अन्वेशक दल भी इस रहस्यमय रूपकुंड क्षेत्र की ऐतिहासिक यात्रा सम्पन्न कर चुके हैं। भारत सरकार के भूगर्भ वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों के एक दल ने भी दुर्गम क्षेत्र में प्रवेश कर अपने विषय का अन्वेशण व परीक्षण किया था। उप्र वन विभाग के एक अधिकारी ने 1955 के सितम्बर में रूपकुंड क्षेत्र का भ्रमण किया व कुछ नरकंकाल, अस्थियां, चप्पल आदि वस्तुऐं एकत्रित कर लखनऊ विश्वविद्यालय के मानव शास्त्र विभाग के प्रसिद्ध मानव शास्त्री (नृंशशास्त्री) एवं विभाग के डायरेक्टर जनरल डा. डी.एन.मजूमदार को परीक्षणार्थ सौंप दी थीं। डा. मजूमदार ने गढ़वाल पर्वतीय क्षेत्र का व्यापक भ्रमण कर और वहां से अस्थियां आदि कुछ सामग्री एकत्रित कर ले गये। भ्रमण कर बताया कि यह घटना तीन-चार सौ वर्ष से कहीं अधिक पुरानी है और ये अस्थि अवशेष किसी तीर्थ यात्री दल के हैं। डा. डी.एन.मजूमदार ने 1957 में यहां से कुछ मानव हड्डियों के नमूने अमेरिकी मानव शरीर विशेषज्ञ डा. गिफन को भेजे जिन्होंने रेडियो कार्बन विधि से परीक्षण कर इन अस्थियों को 400 - 600 साल पुराना बताया। ब्रिटिश व अमेरिका के वैज्ञानिकों ने रूपकुंड क्षेत्र के मानव कंकालों के रहस्यों को सुलझाते हुए विश्वास व्यक्त किया कि ये कंकाल लगभग 600 वर्ष पुराने हैं। यहां के अवशेषों में तिब्बती लोगों के ऊनी कपड़े के बने बूंट, लकड़ी के बर्तनों के टुकड़े, घोड़े की साबूत रालों पर सूखा चमड़ा, टूटी छंतोलियों के रिंगाल और चटाइयों के टुकड़े हैं। याक के अवशेष भी मिले हैं। याक की पीठ पर तिब्बती अपना सामान लाद कर यात्रा करते थे। इन अवशेषों में ख़ास वस्तु बड़े-बड़े दानों की 'हमेल' है, जिसे लामा स्त्रियां पहनती थीं।
नर कंकाल एवं पुराने चप्पल .

बाद में अनेक अन्वेषकों और पर्वतारोहियों ने इस स्थान पर कई बार जाकर इन शवों के बारे में अनुमान लगाए। आखिरकार रूपकुंड के वैज्ञानिक पहलू को प्रकाश में लाने का श्रेय प्रसिद्ध पर्यटक एवं हिमालय अभियान के विशेषज्ञ एवं अन्वेशक साधक विद्वान स्वामी प्रणवानन्द को है जो अनेक बार रूपकुंड गये और उन्होंने रूपकुंड के रहस्य का सभी दृष्टि से अध्ययन किया। स्वामी जी ने सन् 1956 में लगभग ढाई माह तथा सन् 1957 व 58 में दो-दो माह रूपकुंड में शिविर लगाकर नरकंकाल, अस्थियां, बालों की चुटिया, चमड़े के चप्पल व बटुआ, चूड़ियां, लकड़ी व मिट्टी के बर्तन, शंख के टुकड़े, आभूषणों के दाने आदि पर्याप्त वस्तुऐं एकत्रित कीं। उन्होंने ये वस्तुऐं वैज्ञानिक जांच हेतु बाहर भेजीं। यहां से कंकालों को बाहर ले जाकर 1957 से 1961 तक शोध परीक्षण किया जाते रहे। वैज्ञानिक शोध के आधार पर ये नरकंकाल, अस्थियां आदि लगभग 650 वर्ष (750 वर्ष पूर्व) पुराने साबित हुए हैं। स्वामी प्रणवानन्द ने अपने अध्ययन के निष्कर्ष में रूपकुंड में प्राप्त अस्थियां आदि वस्तुऐं कन्नौज के राजा यशोधवल के यात्रा दल के माने हैं जिसमें राजपरिवार के सदस्यों के अलावा अनेक दास-दासियां, कर्मचारी तथा कारोबारी आदि सम्मिलित थे। बताया गया है कि हताहतों की संख्या कम से कम तीन सौ होगी। पशुओं का एक भी अस्थि पंजर नहीं पाया गया। स्वामी प्रणवानन्द जब पुन: चौथी बार अन्वेशण हेतु रूपकुंड गये तो बताया गया कि उप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. सम्पूर्णानन्द द्वारा प्रदत्त नाव में बैठकर उन्होंने झील की परिक्रमा की। यह झील लगभग 12 मीटर लम्बी, 10 मीटर चौड़ी व 2 मीटर गहरी है व झील का धरातल प्राय: सर्वत्र समतल प्रतीत हुआ है।

वर्ष 2004 में भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों के एक दल ने भी संयुक्त रूप से झील का रहस्य खोलने का प्रयास किया। इसी साल नेशनल ज्योग्राफिक के शोधार्थी भी कुछ नमूने इंग्लैंड ले गए। बावजूद इसके गुत्थी सुलझ नहीं पाई। तीस साल तक नरकंकालों पर शोध के बाद मानव शास्त्री विलियम एस. साक्स सिर्फ इतना बता पाए कि ये कंकाल आठवीं सदी के हैं।

(स्रोत: भिन्न भिन्न जगहों से ली गयी जानकारी के आधार पर)

बाकी जानकारी अगले लेख में....
धन्यवाद. 

 सम्पर्क :
देव नेगी
http://devdlove.blogspot.com 




शनिवार, 21 जुलाई 2012

उत्तराखण्ड आन्दोलन का इतिहास एवं गठन – एक परिचय

सबसे पहले उत्तराखण्ड के लिए  अपने प्राण  न्यौछावर करने वाले वीर् शहीदों को शत शत नमन..!!
देवों की जन्म स्थली कही जाने वाली देव भूमि “उत्तराखण्ड” केदारखण्ड मे जम्बू द्वीप के भारत खण्ड मे स्थित राज्य का इतिहास बडा ही रोचक रहा है. इस राज्य के लिए कई बीरों ने अपने प्राणों को भी न्यौचछावर किया और बहुत सारे निरन्तर कई सालों साल तक संघर्ष करते रहे, न जाने कितनी कठिनाई भरे रास्तों से गुजरे और अंत मे नतीजा हमारे सामने है. कई कुर्वानियों के बाद बना उत्तराखण्ड का इतिहास इस प्रकार है:-
  1. १९३८ से पहले गोरखो के आक्रमण व उनके द्वारा किये अत्याचारों से अंग्रेजी शासन द्वारा मुक्ति देने व बाद मे अंग्रेजो द्वारा भी किये गये शोषण से आहत हो कर उत्तराखण्ड के बुद्धिजीवियो मे इस क्षेत्र के लिये एक प्रथक राजनैतिक व प्रशासनिक इकाई गठित करने पर गम्भीरता से सहमति घर बना रही थी. समय-समय पर वे इसकी मांग भी प्रशासन से करते रहे.
  2. १९३८ ५-६ मई, को कांग्रेस के श्रीनगर गढ्वाल सम्मेलन मे क्षेत्र के पिछडेपन को दूर करने के लिये एक प्रथक प्रशासनिक व्यवस्था की भी मांग की गई. इस सम्मेलन मे माननीय प्रताप सिह नेगी, जवाहर लाल नेहरू व विजयलक्षमी पन्डित भी उपस्थित थे.
  3. १९४६: हल्द्वानी सम्मेलन मे कुर्मान्चल केशरी माननीय बद्रीदत्त पान्डेय, पुर्णचन्द्र तिवारी, व गढ्वाल केशरी अनसूया प्रसाद बहुगुणा द्वारा पर्वतीय क्षेत्र के लिये प्रथक प्रशासनिक इकाई गठित करने की माग की किन्तु इसे उत्तराखण्ड के निवासी एवं तात्कालिक सन्युक्त प्रान्त के मुख्यमन्त्री गोविन्द बल्लभ पन्त ने अस्वीकार कर दिया.
  4. १९५२: देश की प्रमुख राजनैतिक दल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रथम महासचिव, पी.सी. जोशी ने भारत सरकार से प्रथक उत्तराखण्ड राज्य गठन करने का एक ग्यापन भारत सरकार को सोपा. पेशावर काण्ड के नायक व प्रसिद्द स्वतन्त्रता सेनानी चन्द्र सिह गढ्वाली ने भी प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु के समक्ष प्रथक पर्वतीय राज्य की माग क एक ग्यापन दिया.
  5. १९५५: २२ मई नई दिल्ली मे पर्वतीय जनविकास समिति की आम सभा सम्पन्न. उत्तराखण्ड क्षेत्र को प्रस्तावित हिमाचल प्रदेश में मिला कर वृहद हिमाचल प्रदेश बनाने की मांग.
  6. १९५६: पृथक हिमाचल प्रदेश बनाने की मांग राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा ठुकराने के बाबजूद गृह मन्त्री गोविन्द बल्लभ पन्त ने अपने बिशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुये हिमाचल प्रदेश की मांग को सिद्धांत रूप में स्वीकार किया. किन्तु उत्तराखण्ड के बारे में कुछ नहीं किया.
  7. १९६६: अगस्त माह में उत्तरप्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र के लोगों ने प्रधानमन्त्री को ग्यापन भेज कर पृथक उत्तराखण्ड राज्य की मांग की.
  8. १९६७: (१० – ११ जून) : जगमोहन सिंह नेगी एवम चन्द्र भानु गुप्त की अगुवाई में रामनगर कांग्रेस सम्मेलन में पर्वतीय क्षेत्र के विकास के लिये पृथक प्रशासनिक आयोग का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा.
  9. २४-२५ जून, पृथक पर्वतीय राज्य प्राप्ति के लिये आठ पर्वतीय जिलों की एक “पर्वतीय राज्य परिषद” का गठन नैनीताल में किया गया जिसमें दयाकृष्ण पान्डेय अध्यक्ष एवम ऋशिबल्लभ सुन्दरियाल, गोविन्द सिहं मेहरा आदि शामिल थे.
  10. १४-१५ अक्टूबर: दिल्ली में उत्तराखण्ड विकास संगोष्टी का उदघाटन तत्कालीन केन्द्रीय मन्त्री अशोक मेहता द्वारा दिया गया जिसमें सांसद एवम टिहरी नरेश मान्वेन्द्र शाह ने क्षेत्र के पिछडेपन को दूर करने के लिये केन्द्र शासित प्रदेश की मांग की.
  11. १९६८: लोकसभा में सांसद एवम टिहरी नरेश मान्वेन्द्र शाह के प्रस्ताव के आधार पर योजना आयोग ने पर्वतीय नियोजन प्रकोष्ठ खोला.
  12. १९७०: (१२ मई) तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी ने पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं का निदान प्राथमिकता से करने की घोषणा की.
  13. १९७१: मा० मान्वेन्द्र शाह, नरेन्द्र सिंह बिष्ट, इन्द्रमणि बडोनी और लक्षमण सिंह जी ने अलग राज्य के लिये कई जगह आन्दोलन किये.
  14. १९७२: श्री रिषिबल्लभ सुन्दरियाल एवम पूरण सिंह डंगवाल सहित २१ लोगों ने अलग राज्य की मांग को लेकर बोट क्लब पर गिरफ़्तारी दी.
  15. १९७३: पर्वतीय राज्य परिषद का नाम उत्तराखण्ड राज्य परिषद किया गया. सांसद प्रताप सिंह बिष्ट अध्यक्ष, मोहन उप्रेती, नारायण सुंदरियाल सदस्य बने.
  16. १९७८: चमोली से विधायक प्रताप सिंह की अगुवाई में बदरीनाथ से दिल्ली बोट क्लब तक पदयात्रा और संसद का घेराव का प्रयास. दिसम्बर में राष्ट्रपति को ग्यापन देते समय १९ महिलाओं सहित ७१ लोगों को तिहाड भेजा गया जिन्हें १२ दिसम्बर को रिहा किया गया.
  17. १९७९: सांसद त्रेपन सिंह नेगी के नेत्रत्व में उत्तराखण्ड राज्य परिषद का गठन. ३१ जनवरी को भारी वर्षा एवम कडाके की ठंड के बाबजूद दिल्ली में १५ हजार से भी अधिक लोगों ने पृथक राज्य के लिये मार्च किया.
  18. १९७९: (२४-२५ जुलाई) मंसूरी में पत्रकार द्वारिका प्रसाद उनियाल के नेत्रत्व में पर्वतीय जन विकास सम्मेलन का आयोजन. इसी में उत्तराखण्ड क्रांति दल की स्थापना. सर्व श्री नित्यानन्द भट्ट, डी.डी. पंत, जगदीश कापडी, के. एन. उनियाल, ललित किशोर पांडे, बीर सिंह ठाकुर, हुकम सिंह पंवार, इन्द्रमणि बडोनी और देवेन्द्र सनवाल ने भाग लिया. सम्मेलन में यह राय बनी कि जब तक उत्तराखण्ड के लोग राजनीतिक संगठन के रूप एकजुट नहीं हो जाते, तब तक उत्तराखण्ड राज्य नहीं बन सकता अर्थात उनका शोषण जारी रहेगा. इसकी परिणिति उत्तराखण्ड क्रांति दल की स्थापना में हुई.
  19. १९८०: उत्तराखण्ड क्रांति दल ने घोषणा की कि उत्तराखण्ड भारतीय संघ का एक शोषण विहीन, वर्ग विहीनऔर धर्म निरपेक्ष राज्य होगा.
  20. १९८२: प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने मई में बद्रीनाथ मे उत्तराखण्ड क्रांति दल के प्रतिनिधि मंडल के साथ ४५ मिनट तक बातचीत की.
  21. १९८३: २० जून को राजधानी दिल्ली में चौधरी चरण सिंह ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि उत्तराखण्ड राज्य की मांग राष्ट्र हित में नही है.
  22. १९८४: भा.क.पा. की सहयोगी छात्र संगठन, आल इन्डिया स्टूडेंट्स फ़ैडरेशन ने सितम्बर, अक्टूबर में पर्वतीय राज्य के मांग को लेकर गढवाल क्षेत्र मे ९०० कि.मी. लम्बी साईकिल यात्रा की. २३ अप्रैल को नैनीताल में उक्रांद ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नैनीताल आगमन पर पृथक राज्य के समर्थन में प्रदर्शन किया.
  23. १९८७: अटल बिहारी वाजपेयी, भा.ज.पा. अध्यक्ष ने, उत्तराखण्ड राज्य मांग को पृथकतावादी नाम दिया. ९ अगस्त को बोट क्लब पर अखिल भारतीय प्रवासी उक्रांद द्वारा सांकेतिक भूख हडताल और प्रधानमंत्री को ग्यापन दिया. इसी दिन आल इन्डिया मुस्लिम यूथ कांन्वेन्सन ने उत्तराखण्ड आन्दोलन को समर्थन दिया.
  24. २३ नबम्बर को युवा नेता धीरेन्द्र प्रताप भदोला ने लोकसभा मे दर्शक दीर्घा में उत्तरखण्ड राज्य निर्माण के समर्थन में नारेबाजी की.
  25. १९८८: २३ फ़रवरी : राज्य आन्दोलन के दूसरे चरण में उक्रांद द्वारा असहयोग आन्दोलन एवम गिरफ़्तारियां दी.
  26. २१ जून: अल्मोडा में ’नये भारत में नया उत्तराखण्ड’ नारे के साथ ’उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी’ का गठन.
  27. २३ अक्टूबर: जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम, नई दिल्ली में हिमालयन कार रैली का उत्तराखण्ड समर्थकों द्वारा विरोध. पुलिस द्वारा लाठी चार्ज.
  28. १७ नबम्बर: पिथौरागढ़ मे नारायण आश्रम से देहारादून तक पैदल यात्रा.
  29. १९८९: मु.मं. मुलायम सिह यादव द्वारा उत्तराखण्ड को उ.प्र. का ताज बता कर अलग राज्य बनाने से साफ़ इन्कार.
  30. १९९०: १० अप्रैल: बोट क्लब पर उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति के तत्वाधान में भा.ज.पा. ने रैली आयोजित की.
  31. १९९१: ११ मार्च: मुलायम सिंह यादव ने उत्तराखण्ड राज्य मांग को पुन: खारिज किया.
  32. १९९१: ३० अगस्त: कांग्रेस नेताओं ने “वृहद उत्तराखण्ड” राज्य बनाने की मांग की.
  33. १९९१: उ.प्र. भा.ज.पा. सरकार द्वारा प्रथक राज्य संबंधी प्रस्ताव संस्तुति के साथ केन्द्र सरकार के पास भेजा. भा.ज.पा. ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी पृथक राज्य का वायदा किया.
  34. 3rd week of December, 1991:During his visit to Haldwani – Nainital, Shri N.D. Tiwari rejected the demand for a separate State in NATIONAL INTEREST
  35. भारतीय क्ष्रमजीवी पत्रकार संघ के उत्तर प्रदेश सम्मेलन मे उत्तराखण्ड राज्य की मांग का समर्थन किया गया. National Movement for States Re-organisation Demand Committee की स्थापना के लिये आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन की समाप्ति पर २५ अप्रैल को नई दिल्ली में संसद सदस्य डा० जयन्त रैंगती ने कहा “छोटे और कमजोर समूहों को राजनैतिक सत्ता में भागीदार बनाने का काम कभी पूरा नहीं किया गया.” कल्याण सिंह सरकार ने केन्द्र सरकार को याद दिलाया कि उत्तारांचल राज्य की मांग स्वीकार न किये जाने के कारण पर्वतीय क्षेत्र की जनता में असंतोष पनप रहा है और अलगाव वाद की भावना घर करती जा रही है.
  36. मार्च १९९२: हल्द्वानी में, नारायण दत्त तिवारी ने उत्तराखण्ड राज्य का पुन: बिरोध किया.
  37. 27th February, UTTARAKHAND BANDH called by “Mukti Morcha”
  38. April 30, 1993: Jantar Mantar : Rally organised by “Uttaranchal Pradesh Sangharsh Samiti”
  39. 6th May, 1993: New Delhi: ALL PARTY MEETING was held in which various senior leaders participated.
  40. १९९३: ५ अगस्त को लोक सभा में उत्तराखण्ड राज्य के मुद्दे पर मतदान. ९८ सदस्यों ने पक्ष में व १५२ ने विपक्ष में मतदान किया.
  41. १९९३: २३ नबम्बर: आंदोलन को नई दिशा देने के लोये दिल्ली व लखनऊ की सरकारों पर ब्यापक जन दबाव बनाने के लिये “उत्तराखण्ड जनमोर्चा” का गठन नई दिल्ली में. इसके प्रमुख आंदोलनकारी – जगदीश नेगी, देब सिंह रावत, राजपाल बिष्ट व बी. डी. थपलियाल आदि थे.
  42. १९९४: २४ अप्रैल: दिल्ली के पूर्व निगमायुक्त बहादुर राम टम्टा के नेत्रत्व में रामलीला मैदान से संसद मार्ग थाने तक बिराट प्रदर्शन.
  43. १९९४: २१ जून: तात्कालिक मु.मं. मुलायम सिंह की सरकार ने उत्तराखण्ड राज्य गठन हेतु “रमाशंकर कौशिक” की अगुवाई में एक उपसमिति का गठन किया. इस समिति ने आठ पर्वतीय जनपदों को किला कर एक प्रथक राज्य ’उत्तराखण्ड’ बनाने के लिये ३५६ प्रष्ठों की एक एतिहासिक रिपोर्ट सरकार को सौंपी. इसमें राजधानी ’गैरसैंण’ बनाने की प्रबल संस्तुति की गई.
  44. १७ जून, १९९४: मुलायम सरकार ने मण्डल कमीशन की रिपोर्ट शिक्षण संस्थानों में लागू करने की अधिसूचना जारी की जिससे उत्तराखण्ड में राजनैतिक भूचाल आ गया और उत्तराखण्ड राज्य की मांग को नया जीवन प्रदान किया.
  45. २२ जून, १९९४: मुलायम सरकार ने उत्तराखण्ड के लिये अतिरिक्त मुख्य सचिव नियुक्त करने की घोषणा की.
  46. ११ जुलाई, १९९४: पौडी में उक्रांद का जोरदार प्रदर्शन – ७९१ लोगों ने गिरफ़्तारी दी.
  47. २ अगस्त, १९९४: पौडी में, वयोवृद्द नेता मा० इन्द्रमणि बडोनी के नेतृत्व में आमरण अनशन प्रारम्भ.
  48. ७,८, एवम ९ अगस्त, १९९४ : पुलिस का लाठी चार्ज. पूरे उत्तराखण्ड में प्रखर राज्य जनांदोलन का बिगुल बजा.
  49. १० अगस्त, १९९४: श्रीनगर में उत्तराखण्ड छात्र संघर्ष समिति का गठन.
  50. १६ अगस्त, १९९४: उत्तराखण्ड राज्य के लिये संसद की चौखट, जंतर मंतर पर उत्तराखण्ड आंदोलनकारी संगठनों का ऎतिहासिक धरना प्रारम्भ हुआ जो उत्तराखण्ड आंदोलन संचालन समिति व बाद में उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के नाम से बिख्यात हुआ. दिल्ली,हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के तमाम आंदोलनकारी संगठन इससे जुड गये. यह इस आन्दोलन का एक केन्द्रबिन्दु बन गया जहां पर दिन रात निरन्तर आन्दोलन जारी रहा.
  51. २४ अगस्त, १९९४: विधानसभा में दूसरी बार अलग राज्य का प्रस्ताव पारित. दो छात्रों, श्री मोहन पाठक और श्री मनमोहन तिवारी ने संसद में नारेबाजी करते हुये उत्तराखण्ड राज्य के समर्थन में छलांग लगाई.
  52. ३० अगस्त, १९९४: दिल्ली में पूरे देश के आये हुये हजारों उत्तराखण्डियों ने प्रचण्ड प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोडे गये.
  53. १ सितम्बर, १९९४: उत्तराखण्ड आंदोलन के इतिहास में एक काला दिन..खटीमा मे उत्तराखण्डी आंदोलनकारियों पर पुलिस ने शर्मनाक ढंग से फ़ायरिंग की. आठ आंदोलनकारियों की मौत हल्द्वानी व खटीमा में कर्फ़्यू……
  54. २ सितम्बर, १९९४:मसूरी में उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों पर कहर.पुलिस उप-अधीक्षक सहित आठ आंदोलनकारी शहीद.इसके बिरोध में दिल्ली सहित पूरे देश में भारी आक्रोश.. और प्रदर्शन. पौड़ी में छात्रों की ऎतिहासिक रैली मे हजारों लोगों ने भाग लिया.
  55. ८ सितम्बर, १९९४:छात्रों के आव्हान पर ४८ घन्टे का उत्तराखण्ड बन्द.
  56. २० सितम्बर, १९९४:पर्वतीय कर्मचारी शिक्षक संगठन के बैनर तले राज्य कर्मचारी बेमियादी हडताल पर गये.
  57. १ अक्टूबर, १९९४ यह दिन उत्तराखण्ड आन्दोलनकारियों के लिये मनहूस दिन रहा. २ अक्टूबर को लालकिला, दिल्ली में आयोजित होने वाली रैली मे लाखों उत्तराखन्डी शान्तिपूर्वक दिल्ली की ओर बढ रहे थे कि उ.प्र. के सरकार को किसी शैतान ने अपने बस में कर लिया. मुजफ़्फ़रनगर में पुलिस ने आन्दोलनकारियों का दमन करने के लिये भयंकर नरसंहार किया. महिलाओं के साथ अभद्रता की. यहां पर आठ आन्दोलनकारी शहीद हुये.
  58. जैसे कि स्वाभाविक है,मुजफ़्फ़रनगर में पुलिस की बर्बरता से समूचे उत्तराखण्ड में व्यापक आक्रोश फ़ैल गया. इस कुकृत्य के बिरोध में लोग सड्कों पर उतर आये. किन्तु अपनी घिनौनी करतूत पर शर्मिन्दा होने होने की बजाय, शैतानी प्रशासन ने फ़िर ताण्ड्व किया. देहरादून व कोटद्वार मे दो-दो और नैनीताल मे एक आंदोलनकारी पुन: शहीद हुये.
  59. ५ अक्टूबर, १९९४:इलाहाबाद हाइकोर्ट ने पर्वतीय शिक्षण संस्थाओं में लागू २७% आरक्षण पर रोक लगाई.जहां समूचा उत्तराखण्ड मुलायम व नरसिंहा राव सरकारों के दमन में पिस रहा था, उक्रांद के नेता आपसी कलह में उलझे हुये थे जिसकी परिणिति हुई उक्रांद का बिभाजन.मुजफ़्फ़रनगर गोली काण्ड के सी.बी.आइ. से जांच के आदेश.इसी दिन पुलिस की गोली से देहरादून में एक महिला आंदोलनकारी शहीद. महिलायें इस आंदोलन में बढ चढ कर भाग ले रहीं थी.
  60. २५ फ़रवरी, १९९५: इस दिन उत्तराखण्ड के प्रमुख आंदोलनकारी संगठनों का दो दिवसीय “प्रथम अखिलभारतीय सम्मेलन” दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू बि.बि. के सिटी सेंटर में डा० कर्ण सिंह के उदघाटन संबोधन के साथ शुरू हुवा.
  61. २३ मार्च, १९९५: शहीद भगत सिंह आजाद के शहादत दिवस पर, ले.जन. गजेन्द्र सिंह रावत के नेत्रत्व में पूर्व सैन्य अधिकारियों व पूर्व सैनिकों ने अन्य आंदोलनकारियौं के साथ मिलकर बिशाल प्रदर्शन किया. गौरतलब है कि इस प्रदर्शन में १३ पूर्व जनरल शामिल थे.
  62. १७ – २३ अगस्त, १९९५:केन्द्र सरकार की कान पर जूं न रेंगती देख, उत्तराखण्ड जन मोर्चा व अन्य आंदोलनकारी संगठनों के संयुक्त आव्हान पर पुन: “जेल भरो” आंदोलन शुरू किया इसमें भारी संख्या में लोगों ने गिरफ़्तारी दी. प्रशासन को अस्थाई जेल के ब्यवस्था करनी पढी. चार दिन बाद आंदोलनकारियों को रिहा कर दिया गया.
  63. ३० दिसम्बर, १९९५:मुजफ़्फ़रनगर काण्ड के अपराधिओं को तत्काल दण्डित करने की मांग को लेकर उत्तराखण्ड की सैकडों महिलाओं ने होम मिनिस्टर के निवास पर प्रचण्ड प्रदर्शन किया.
  64. ८ अक्तूबर, १९९५:स्थान : श्रीयंत्र टापू (श्रीनगर गढ्वाल)अलकनंदा की जलधारा के बीच स्थित श्रीयंत्र टापू पर उत्तराखण्ड क्रान्ति दल (डंगवाल) के आंदोलनकारियों ने प्रथक उत्तराखण्ड राज्य के लिये ’आमरण अनशन’ शुरू किया.
  65. ५ नवम्बर, १९९५:स्थान : वही.पुलिस ने आंदोलनकारियों के दमन का कुचक्र फ़िर चला. दो आंदोलनकारियों को अलकनंदा की तेज जलधारा में बहा देने का कलंक पुलिस के माथे लगा. श्री डंगवाल सहित अनेक आंदोलनकारियों को सहारनपुर जेल भेज दिया गया.आन्दोलनकारी किसी भी प्रकार से हार मानने को तैयार नहीं थे.
  66. १२ अक्तूबर, १९९५:उत्तराखण्ड क्रान्ति दल (डंगवाल) के नेता श्री दिवाकर भट्ट ने खैट पर्वत (जिला टिहरी) पर पुन: आमरण अनसन शुरु किया.और२१ दिसम्बर, १९९५ आज, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल, श्री मोतीलाल बोरा, ने उत्तराखण्ड क्रान्ति दल (डंगवाल) को वार्ता पर बुलाया.
  67. १२ जनवरी, १९९६:खैट पर्वत पर अनशन पर बैठै नेता, श्री दिवाकर भट्ट केन्द्र सरकार के आमंत्रण पर अन्य साथियों सहित दिल्ली में अनशन पर बैठै अन्य आंदोलनकारियों के पास (जंतर मंतर) पहुचे. यहां ग्रिह राज्य़मंत्री एवम बिदेश राज्य मंत्री ने आंदोलनकारियों से अनसन खत्म करने का अनुरोध किया.तब इसके बाद:
  68. १९-२२ जनवरी, १९९६ भारत सरकार और आंदोलनकारियों के बीच आधिकारिक रूप से पहली वार्ता शुरू हुयी. इस वार्ता में मुख्य रूप से उपस्थित नेता इस प्रकार हैं:सर्वश्री: दिवाकर भट्ट, पूरण सिंह डंगवाल, मेजर जनरल शैलेन्द्र राज, पी. सी. थपलियाल, प्रकाश सुमन ध्यानी, अवतार रावत, देवसिंह रावत, राजेन्द्र शाह, श्रीमती कौशल्या डबराल के साथ साथ प्रख्यात पर्यावरणविद सुन्दरलाल बहुगुणा, एस.के. शर्मा एवम छात्र नेता .
  69. २६ जनवरी, १९९६: (गणतंत्र दिवस)स्थान : विजय चौक (इस स्थान के गणतंत्र दिवस परेड आरम्भ होती है)उत्तराखण्ड संयुक्त महिला संघर्ष समिति की आंदोलनकारियों ने ४४ महिलाओं व १८ नवयुवकों के लेकर बी.आई.पी. गैलरी (विजय चौक) में उत्तराखण्ड राज्य के समर्थन में जोरदार नारेबाजी की. श्रीमती उषा नेगी को वहा पर गिरफ़्तार किया गया.
  70. ९ फ़रवरी, १९९६इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों पर मुजफ़्फ़रनगर एवम अन्य स्थानों पर दमन के आरोपों के लिये उत्तरप्रदेश सरकार व केन्द्र सरकार को कटघरे में रखते हुये इसे यहूदियों पर नाजियों द्वारा किये गये अत्याचार के बराबर बताया.
  71. १५ अगस्त्, १९९६:प्रधानमंत्री एच. डी. देवागौडा ने लाल किले के प्रचीर से उत्तराखण्ड राज्य गठन का संकल्प ब्यक्त किया.
  72. १५ अगस्त्, १९९७:प्रधानमंत्री इन्द्र कुमार गुजराल ने भी लाल किले के प्रचीर से उत्तराखण्ड राज्य गठन का संकल्प दोहराया.
  73. १९९८ में, अटल बिहारी के नेतृत्त्व वाली भा.ज.पा. की गठ्बंधन सरकार ने पहली बार राष्ट्रपति के माध्यम से उत्तरप्रदेश सरकार को उत्तराखण्ड राज्य बिधेयक प्रेषित किया.इस बीच, दिल्ली में जन्तर मन्तर पर आंदोलनकारियों का धरना जारी था.
  74. ९ अगस्त, १९९८:भारी पुलिस बल ने जन्तर मन्तर पर आंदोलनकारियों पर धावा बोल दिया और आन्दोलनकारियों को तितर-बितर कर दिया. परिणामस्वरूप धरना स्थल वहा से मंदिर मार्ग में स्थानतरित हो गया. बाद में पुन: जन्तर मन्तर पर आगया.
  75. १९९९ कांग्रेस नेता, हरीश रावत भी संघर्ष में कूदे.
  76. 27 July, 2000:Uttar Pradesh Reorganisation Bill, 2000 presented in Lok Sabha.
  77. 1 August, 2000:LOK SABHA passed the Bill.
  78. 10 August, 2000Rajya Sabha Passed the Bill.
  79. १५ अगस्त, २००० लालकिले के प्रचीर से प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी ने उत्तराखण्ड राज्य गठन के अपने वादे को पूरा करने की घोषणा की.
  80. १६ अगस्त, २०००स्थान : जन्तर मन्तर, दिल्ली.यहां पर उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के श्री देब सिंह रावत के उत्तराखण्ड राज्य के गठन की मांग को लेकर ६ वर्षों (१९९४-२०००) के लगातार धरने का हर्षोल्लास के साथ समापन करने हेतु सभी आंदोलनकारियों ने संगठन व दलों की सी्माओं को तोडते हुये समारोह में भाग लिया. इस अवसर पर यहां आने वालओं में सर्वश्री बची सिंह रावत, सतपाल महाराज, डा० हरक सिंह रावत, एस.के. शर्मा, अवतार रावत, रणजीत सिंह पंवार, प्रताप रावत नरेन्द्र भाकुनी व अन्य शामिल थे.
  81. २० अगस्त, २००० भारत के राष्ट्रपति द्वारा राज्य गठन बिधेयक को मंजूरी दे दी गई.
नये राज्य का संगठन :-
आखिर में 9 नवंबर सन्‌ 2000 को भारत के सत्ताईसवें राज्‍य के रूप में उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) नाम से इस नये प्रदेश का जन्‍म हुआ , इससे पहले ये उत्तर प्रदेश में ही शामिल था. यह 13 जिलों में विभक्त है, 7 गढ़वाल में – देहरादून , उत्तरकाशी , पौड़ी , टेहरी (अब नई टेहरी) , चमोली , रूद्रप्रयाग और हरिद्वार और 6 कुमाऊँ में अल्‍मोड़ा , रानीखेत , पिथौरागढ़ , चम्‍पावत , बागेश्‍वर और उधम सिंह नगर । यह पूर्व में नेपाल , उत्तर में चीन , पश्‍चिम में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण में उत्तर प्रदेश से घिरा हुआ है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि धरातल पर यदि कहीं समाजवाद दिखाई देता है तो वह इस क्षेत्र में देखने को मिलता है इसलिए यहाँ की संस्कृति संसार की श्रेष्ठ संस्कृतियों में मानी जाती है। इस भूमि की पवित्रता एवं प्राकृतिक विशेषता के कारण यहाँ के निवासीयों में भी इसका प्रभाव परिलक्षित होता है अर्थात् प्रकृति प्रदत शिक्षण द्वारा यहाँ के निवासी ईमानदार, सत्यवादी, शांत स्वभाव, निश्छल, कर्मशील एवं ईश्वर प्रेमी होते हैं। देवताओं के वास करने वाली इस पवित्र जगह मे आदिगुरू शंकराचार्य ने चारो धामों की स्थापना की : ( श्री बदरी नाथ , श्री केदार नाथ, श्री गंगोत्री एवं श्री यमनोत्री) और आज यही आस्था का माध्यम बना हुआ है आज यहाँ प्रतिवर्ष लाखों की तादत मे आस्था में विश्वाश रखने वाले श्रधालु भगवान के द्वार पर जाते है.!!
(स्रोत:- ये जानकारी स्वत: एवं भिन्न भिन्न स्रोतों के माध्यम से उपलब्ध करायी गयी है)
धन्यवाद..!!
देव नेगी.
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